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*श्रीनिताई चाँद*
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*श्रृंगार वट*
प्रभुपाद श्रीनन्दकिशोरदास का गैया चराने वाला सेवक था भोंदू, परन्तु साक्षात् श्रीगोपाल का लंगोटिया यार निकला।कन्हैया के साथ भाण्डीर वन में गैया चराता, खेलता-कूदता और छीनके खाता उसके साथ श्रीप्रभुपाद ने एक दिन जब भोंदू को सिर पर दाल-बाटी का सामान ले जाते हुए देखा, तो पूछने पर पता लगा कि आज भोंदू ही दाल-बाटी बनाकर श्रीगोपाल -बलराम तथा सखाओं को खिलायेगा। आप जानते थे कि भोंदू एक सच्चा, निर्मल मन, सरलहृदय ब्रजवासी बालक है। उसके साथ जाने का इन्होंने भी आग्रह किया। ये अपने सिर पर सारा सामान उठाकर भाण्डीर वन गये वहाँ साक्षात् ।श्रीकृष्ण-बलराम के ग्वालबालों सहित दर्शन किये एवं भोजन-क्रीड़ा में सेवा सम्पादन कर कृतार्थ हो गये। इनके अप्रतिम प्रभाव को देखकर जोधपुर के राजा ने अलवर (राजस्थान) में बहुत सी जमीन श्रीनिताईचाँद (शृंगारवट) के नाम दान कर दी। इनके बाद प्रभुपाद श्रीप्रेमानन्द गोस्वामी इन्हीं श्रीश्रीनिताई–गौर की सेवा सम्पादन करते थे।परम तेजस्वी किन्तु अत्यन्त विनम्र थे। वे किसी को चरण स्पर्श न करने देते। उनके भजन से प्रभावित हो तत्कालीन शासन ने श्रृंगारवट की सेवा व्यवस्था के लिए बेगमपुर, आटस, जौन जहाँगीरपुर तथा सकराया—ये पाँच गाँव सौंप दिये।
श्रीप्रेमानन्द प्रभुपाद ऐसे सिद्ध पुरुष थे कि कुम्भ के अवसर पर श्रृंगारवट में असंख्य साधु-वैष्णवों की झड़ा पंगत थी। मालपुए और साग परोसा जा रहा था। सबेरे से सन्ध्या हो गयी। भण्डार में घी नहीं रहा। आपने यमुना जी का जल टीन भर-भर कर कड़ाही में डाला और पुए निकलवाते गये। उस समय सब सन्तुष्ट होकर प्रसाद पाकर चले गये। दूसरे दिन जितने टीन जल
लिया था, उतने ही टीन घी के मंगाकर यमुनाजी में प्रवाहित कर दिये। मूल संकर्षण स्वरूप श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु तीर्थाटन करते हुए लगभग संवत १५५८ में वृन्दावन पधारे थे। उन्होंने मधुरलीलामण्डित इसी स्थल पर अनेक दिन निवास कर अपनी पूर्वलीला (व्रज-लीला) का स्मरण कर-करके इसे प्रेमाश्रुओं से सिंचित किया था। तभी से इसे 'श्रीनित्यानन्दप्रभु गद्दी' कहा जाता रहा है।
इसे दिव्य स्थान तथा स्वतः ब्रजप्रेम प्रदायक साधना का मुख्य स्थल जानकर काशी के राजारानी इसी श्रृंगारवट के विशाल प्रांगण में मौलसरी के वृक्षों के रूप में अपनी साधना के साथ श्रीश्रीनिताई-गौर की पुष्प-सेवा अनेक काल तक करते रहे। मादा-मौलसरी वृक्ष बारहों महीने सेवार्थ फूल प्रदान करता रहा। वेशधारी साक्षात् ब्राह्मणी के रूप में निशान्त काल में श्रृंगारवट निवासी श्रीमन नित्यानन्द वंशजों ने अनेक बार उन्हें बैठे और भजन स्मरण करते देखा। परम पूज्य चरण श्रीपाद गोस्वामी श्रीदेवकी नन्दन जी महाराज यह बात कहा करते थे। उन्होंने स्वयम भी उस दम्पति को कई बार देखा किसी गोस्वामी स्वरूप को प्रांगण में आते देखकर वे उठ खड़े होते और अपने-अपने वृक्षरूप में लीन हो जाते थे। लगभग दस वर्ष पूर्व पहले मादा वृष और फिर एक वर्ष बाद नर वृक्ष बिना किसी आँधी तूफान के अचानक टूट पड़े। अति ऊँचे विशाल वृक्ष थे, किन्तु टूटने पर मन्दिर के किसी भाग की क्षति नहीं हुई। नववृक्ष मौलसरी का चार–पाँच फुट ऊँचा स्तम्भ अब भी अवशेष रूप में दर्शनीय है, जो फिर प्रस्फुटित होने लगा है।
श्रीनित्यानन्दप्रभु की गद्दी होने के कारण श्रृंगारवट मन्दिर सभी गौड़ीयवैष्णव
सम्प्रदाय के सप्त देवालयों में सम्मान–पूजा का उच्चतम स्थान रखता है। वृन्दावन में प्रेमदाता श्रीनिताईचाँद के चरण चिह्नों से अंकित यह एकमात्र स्थान है और दुःख है कि आज जीर्ण-शीर्ण है।
क्रमशः
श्रीगुरुगौरांगो जयते !!
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