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*श्रीनिताई चाँद*

   7⃣4⃣

*खण्ड तृतीय*

*श्रीनिताई- पर्रिकर*

*तस्य श्रीकृष्णचैतन्य सत्प्रेमामरशाखिनः ।*
*ऊर्ध्वस्कन्धावधूतेन्दोः शाखारूपान-गणान् नुमः ।।*

    श्रीश्रीकृष्णचैतन्य रूप प्रेमकल्पतरु के उच्चतम स्कन्धस्वरूप अवधत
श्रीमन्नित्यानन्द के शाखारूप अनुगत भक्तो की मैं वन्दना करता है।

    श्रीमन्निताईचाँद के असंख्य अलौकिक चरितों में से कुछ एक चरितों का संक्षिप्त वर्णन कर इस खण्ड में उनके भक्त–पार्षदों के भुवन–पावन चरितों का हम किञ्चित् आस्वादन करेंगे। वे समस्त पार्षद निरन्तर परमानन्द में विभोर रहने वाले थे। सबका गोपाल-भाव था एवं कृष्णचैतन्य संकीर्तन-गान के सिवा उन्हें और कोई काम न था। आनुषंगिक रूप में आश्रमोचित आचरण करते हुए भी वे संसार से नितान्त अनासक्त थे। अदभुत वेश-भूषा थी उनकी।।कोई वंशी-वेणु, कोई श्रृंग धारण करता था। गले में गूंजाहार, कटि में काछनी, पावँ में नूपुरों से विभूषित रहते थे। पुलक–कम्प-अश्रु आदि उनके 'अलंकार थे। असाधारण चरित्र हैं उनके भी श्रीनिताईचाँद की कृपा शक्ति से।

    पूज्यपाद श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामिचरण ने कहा है-

*नित्यानन्द पदाम्भोजभृगान् प्रेममधून्मदान्।*
*नत्वाखिलान् तेषु मुख्या लिख्यन्ते कतिचिन्मया।।।*

   प्रेम मकरन्द को पान करने के लिए सदा उन्मत्त, श्रीनिताईचाँद के चारुचरणारविन्द के मधुकर स्वरूप जो सब भक्तवृन्द हैं, मैं उन सबको प्रणाम करता हूँ (समस्त का चरित वर्णन करना तो नितान्त असम्भव है।) उनमें से मुख्य–मुख्य कुछ एक भक्तों के चरितों का मैं यहाँ वर्णन करता हूँ।)श्रीकविराज का अनुसरण करते हुए हम भी यहाँ कुछ एक श्रीमन्नित्यानन्द प्रभुपाद के पार्षदों के चरितामृत का किञ्चित् आस्वादन करते हैं। इनके माध्यम से श्रीनिताईचाँद की भी अनेक विचित्र लीलाओं का रसास्वादन होगा।
*ईश्वरी श्रीजान्ह्वा देवी*

*नित्यानन्द्रप्रियां प्रेमभक्तिरत्न प्रदायिनीम् ।*
*श्रीजाहवीश्वरीं वन्दे तापत्रय-निवारणीम् ।।*

    तीनों तापों का निवारण करने वाली श्रीमन्नित्यानन्द प्रिया ईश्वरी जान्ह्वा देवी की मैं वन्दना करता हूँ जो प्रेमभक्ति रत्न को प्रदान करने वाली हैं।

  जैसा कि पहले वर्णन किया जा चुका है. श्रीजावादेवी जी पण्डितश्रीसूर्यदास की कन्या थी और हमारे श्रीनिताईचांद की पत्नी नित्यशक्ति।

   ब्रजलीला में यह थीं श्रीरेवती एवं श्रीअनंगमञ्जरी।।

*श्रीवारुणी रेवतवंशसम्भते तस्यप्रिये द्वे वसुधा च जाहवी ।।*
*श्रीसूर्यदासस्य महात्मनः सुते ककुदमरूपस्य च सूर्यतेजसः ।।*
*केचित् श्रीवसुधादेवी कलावपि विवृष्यते ।*
*अनँगमञ्जरी केचिज्जाहवीच प्रचक्षते ।।*
*उभयन्तु समीचीनं पूर्वन्यायात सतां मतम् ।।*

गौरगणोदेश दीपिका ६५-६६

   ब्रजलीला में वारुणी और रैयतवंश में उत्पन्न होने वाली रेवती श्रीबलराम जी की जो दो पत्नियां थी व दोनो श्रीवसुधा एव श्रीजान्ह्वी नाम से श्रीमनित्यानन्द प्रभ की पत्नियों / नवदीप लीला में। ये दोनों सूर्य के समान तेजश्वी पण्डित अर्यदास की कन्याएं थी । वे सूर्यदास पहले रेवती के पिता ककदमी थे। कोई भी वसुधा को अन्नगमन्जरी तथा कोई कोई जान्ह्वी भी कहते हैं। सत्पुरुषों के पूर्व न्याय दोनों ही समाचीन है। ।

   खड़देह ग्राम में आप वास कर समस्त जीवों को प्रेमभक्ति प्रदान करती थीं।
इन्होंने अपने वर्तमान रहते ही अपनी एक सुन्दर श्रीमूर्ति का निर्माण कराया कि सबसे यह कहा कि यह श्री राधिका जी की श्रीमूर्ति है।श्रीवृन्दावन में श्रीगोपीनाथ जी को अर्पण करना है।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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