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*श्रीनिताई गौर*
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*ईश्वरी श्रीजानहवा देवी*
खडदेह ग्राम में आप वास कर समस्त जीवों को प्रेमभक्ति प्रदान करती थीं। इन्होंने अपने वर्तमान रहते हुए ही अपनी एक सुन्दर मूर्ति का निर्माण कराया किन्तु सबसे यह कहा कि यह श्रीराधिका जी की श्रीमूर्ति है। श्रीवृन्दावन में श्रीगोपीनाथ जी को इसे अर्पण करना है। माता जान्ह्वा के हृदयंगत भावों को कोई न जान सका। श्रीनिवासाचार्य प्रभु गौड़ीय भक्तवृन्द के साथ उस श्रीविग्रह को श्रीवृन्दावन में लाये और अनेक महोत्सव के साथ इस श्रीविग्रह को श्रीगोपीनाथ जी के वाम भाग में सेवार्थ विराजमान कर दिया गया। श्रीगोपीनाथ जी के वाम भाग में जो पहले श्रीराधाजी का विग्रह विराजमान था, उसे दायें भाग में स्थापन कर दिया गया ,दर्शन करने वालों को बड़ा आश्चर्य हुआ।
जयपुर नरेश श्रीमानसिंह जब वृन्दावन आये और उन्होंने श्रीगोपीनाथ जी के दोनों तरफ श्रीराधा जी के विग्रह दर्शन किये तो बड़े चकित हुये।पुजारी अधिकारी आदि से बार-बार पूछा। उन्होंने सब वृत्तान्त कह सुनाया,परन्तु उनको सन्तोष नहीं हुआ। श्रीजाह्नवी जी ने स्वप्न में जयपुर नरेश से कहा–राजन् श्रीराधारानी बार-बार अकारण श्रीगोपीनाथ जी से मान करती रहती हैं।श्रीगोपीनाथ अति व्याकुल, अधीर हो उठते हैं। अतः मैं ही श्रीराधारानी के मान प्रशमनं करने के लिए आकर विराजमान हुई हूँ। राजा को उस आदेश से सन्तोष हुआ और उसने इस रहस्य का उद्घाटन किया सो आज तक श्रीगोपीनाथ जी के वाम अंग में श्रीजानहवा जी विराजमान हैं।श्रीगोपीनाथ जी ने स्वयं ही श्रीजान्ह्वा जी को इस प्रकार वृन्दावन आ अपने वाम भाग में विराजमान होने की एवं श्रीप्रियाजी के मान प्रशमन करने में सहायता करने की प्रेरणा की थी।
श्रीनिताई-प्रभु के पार्षद श्रीअभिराम गोस्वामी के पास एक ‘जयमंगल नाम का चाबुक था, जिसका स्पर्श पाते ही शरीर में प्रेमभक्ति का संचार हो जाता था। जिस समय श्रीनिवास अभी शिशु थे और वे खड़देह मे श्री जानहवा जी के दर्शन करने आये तो इन्होंने उसे आलिंगन किया और श्रीईशान (श्रीमहाप्रभु का एक सेवक) के साथ श्रीनिवास को श्रीअभिराम ने गोस्वामी के पास भेज दिया। श्रीजानहवा जी ने श्रीअभिराम को एक पत्र लिख भेजा कि श्रीनिवास को तुम्हारे पास भेज रही हूँ तुम इसमें अपने चाबुक से प्रेम संचार कर देना। ऐसा ही हुआ। श्रीअभिराम जी ने श्रीनिवास की परीक्षा लेकर माँ जानहवा जी की आज्ञानुसार उनमें तीन जय मंगल चाबुक मारे, जिससे श्रीनिवास में प्रेमभक्ति का तत्क्षण संचार हो गया। श्रीनिवासाचार्य की जो अदभुत महिमा है एवं प्रभावशाली चरित्र हैं वे इन्हीं श्रीजानहवा जी की कृपा का फल है।
माँ जानहवा के भक्तिदान से धरणी धन्य हो उठी थीं। वृन्दावन के लिए पधारीं तो रास्ते में वृहद ग्राम में पहुँची और वहाँ कुछ दिन रहने की इन्होंने इच्छा प्रकट की। वृहद ग्राम के लोग बड़े पाखण्डी, दुराचारी एवं हिंसक थे।वैष्णव आचरण के तो पूरे शत्रु थे।
क्रमशः
श्रीगुरुगौरांगो जयते !!
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