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*श्रीनिताई चाँद*

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*ईश्वरी श्रीजान्हवा देवी*

   माँ जानहवा के भक्तिदान से धरणी धन्य हो उठी थी। वृन्दावन के लिए पधारीं तो रास्ते में वृहद ग्राम में पहुंची और वहाँ कुछ दिन रहने की इन्होंने इच्छा प्रकट की। वृहद ग्राम के लोग बड़े पाखण्डी, दुराचारी एवं हिंसक थे।वैष्णव आचरण के तो पूरे शत्रु थे। सन्ध्या के समय समस्त वैष्णवगण श्रीईश्वरी की जब वन्दना कर रहे थे। वहाँ के पाखण्डी लोग यह देखकर उन सबका मजाक उड़ाने लगे। वे कहने लगे—यह सब मूर्ख हैं मनुष्य होकर मनुष्य फिर एक नारी को प्रणाम करते हैं। हमारी चण्डी देवी को तो ये प्रणाम नहीं करते-इनका चण्डीदेवी के प्रति घोर अपराध है। इतना कहकर वे चण्डीदेवी के मन्दिर में पहुंचे और उनको बार-बार प्रार्थना करने लगे-“हे देवि ! आज हम इन सब (वैष्णवों) का संहार कर देंगे। यदि हमने आज तक तुम्हारी मन-वाणी-कर्म से कुछ सेवा की है तो तुम हमारी रक्षा करना।” वे सब रात्रि को इन सबकी हिंसा करने का संकल्प करके अपने-अपने घर चले गये।

    सोते ही उन्हें गहरी नींद आ गयी। इधर चंडी देवी अत्यंत क्रोधित होकर प्रचंड तलवार अपने  हाथ में लेकर उन पाखण्डियों को नष्ट करने के निकल पड़ीं।सबको सपने में गर्ज -गर्ज कर देवी कहने लगी-अरे ओ पाखंडियों आज मैं तुम सबका संहार करूंगी। तुमने परम आराध्या मेरी स्वामिनी का अपराध किया है। वैष्णवों का अपमान तुमने अहंकार में किया है।नहीं जानते वे विप्रपत्नी नहीं हैं श्रीनिताईचाँद बलराम की आदि शक्ति श्रीजानहवी हैं मेरी पूज्या हैं। इनका तो नाम लेने से भवभय दूर हो जाता है। करुणामूर्ति जीवों को प्रेम-भक्ति वितरण करने के लिए प्रकट हुई।तुम सब उनकी शरण ग्रहण करो, वरना आज तुहारे मस्तक काटे देती हूँ।चौंक उठे सब पाखण्डिगण। धिक्कार करने लगे अपने को प्रातः होते ही श्रीईश्वरी के चरणों में आकर शरण ली। समस्त वैष्णवों के चरणों में अपने अपराधों की क्षमा याचना की। माँ तो करुणा की मूर्ति । वैष्णदगण जीवों के प्रति सदा दयालु होते हैं। माँ ईश्वरी ने सबको अभय दान दिया। भक्ति संचार कर उन सबका उद्धार कर दिया। दो-चार दिन तक वृहद ग्राम में रहकर समस्त ग्रामों को कृष्णनाम प्रेम में सराबोर कर दिया।

   निर्जन जंगल में रहने वाले दो डाकुओं ने जब सुना कि इस प्रकार करुणामूर्ति माँ जानहवा ने सबका उद्धार कर दिया है, वे भी इनकी शरण में आये और कातर–दीन होकर अपने उद्धार की प्रार्थना की। श्रीईश्वरी ने उन्हें भी प्रेमभक्ति का दान प्रदान किया।

इसी प्रकार वृन्दावन को जाते समय रास्ते में ईश्वरी श्रीजानहवा जी ने एक महान् डाकू कुतबुद्दीन का भी उद्धार किया। अनेक यवनों को लेकर वह इन्हें लूटने के लिए आया। परन्तु सारी रात वह डाकू अपने साथियों सहित इधर-उधर भटकता रहा, ईश्वरी तक पहुँच ही नहीं सका। प्रातःकाल हो गया और सबके सब व्याकुल और भयभीत हो उठे। अन्त में ईश्वरी जानहवा जी की शरण में आकर वह डाकू आप बीती निवेदन करने लगा-उसने कहा-'ईश्वरि !मैं आपकी शरण में हूँ, आप मेरी रक्षा करें।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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