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*श्रीनिताई चाँद*

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*प्रभुपाद श्रीवीरचन्द्र गोस्वामी*

  श्रीवीरचन्द्र गोस्वामी लौकिक-लीला में श्रीनिताई चाँद के घर श्रीमती वसुधा देवी के उदर से अगहन चतुर्दशी के दिन पुत्र रूप में अवतीर्ण हुए । वीरभद्र तथा जगत दुर्लभ नामों से भी यह विख्यात हुए। तत्वतः ये क्षीर समुद्रशायी विष्णु हैं एवम श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के अभिन्न विग्रह हैं। निष्ठ
और उल्मुक उन दोनों भाइयों का भी कार्यवश इनमें प्रवेश था।

श्रीलकविकर्णपूर चरण ने लिखा है-

*संकर्षणस्य यो व्यूहः पयोब्धिशायि नामकः ।*
*स एव वीरचन्द्रोऽभूच्चैतन्याभिन्न विग्रहः ।।*

श्रीगौरगणोद्देशदीपिका ६७-६

    श्रीसंकर्षण-बलराम जी का जो व्यूह–अंश क्षीर-समुद्रशायी श्रीविष्णु हैं।
वह ही श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु के पुत्र रूप में श्रीवीरचनद्र गोस्वामी नाम से आविर्भूत हुये। ये श्रीचैतन्यदेव के अभिन्न विग्रह हैं।

    श्रीनित्यानन्द प्रभु के एक पार्षद थे श्रीअभिराम गोस्वामी, जो रामदास
राम, अभिराम ठाकुर आदि नाम से भी विख्यात् थे। (इनका चरित्र आगे वर्णन
किया गया है) आप इतने तेजस्वी थे कि यदि आप श्रीविग्रह एवं श्रीशालिग्राम को प्रणाम करते तो वह फट जाते थे। श्रीनित्यानन्दप्रभु को पहले एक-एक करके सात पुत्र हुए। श्रीअभिराम के प्रणाम करते ही क्रमशः सातों का निधन हो गया। अब इन्होंने श्रीवीरचन्द्र के जन्म का समाचार सुना तो ये श्रीनिताईचाँद के घर पहुँचे और कहा-मैं वीरभद्र को प्रणाम करूंगा। माता वसुधा रानी बहुत भयभीत हो उठीं। श्रीवीरचन्द्र पलंग पर सो रहे थे। अद्भुत सुन्दर शिशु रूप था इनका, अनेक भूषणों से विभूषित कर सुलाया था माँ ने। श्रीअभिराम ने दर्शन करते ही इन्हें प्रणाम किया। शिशु वीरचन्द्र ने उनके प्रणाम को स्वीकार कर सहन किया। श्रीअभिराम जान गये कि ये श्रीगौरांग का द्वितीय कलेवर है।

   इन्होंने श्रीवीरभद्राष्टक में कहा है-

*'सोऽयं प्रसीदतु हरिः किल वीरभद्रः*

   इन्होंने माता जाहवा से ही गुरुमन्त्र-दीक्षा ग्रहण की। इनकी दो पत्नियाँ थी–श्रीमती लक्ष्मी एवं श्रीनारायणी, जो झामटपुर निवासी श्रीश्रीयदुनन्दनाचार्य की कन्यायें थीं। इनके तीन पुत्र हुये-श्रीगोपीजन वल्लभ, श्रीरामकृष्ण,रामचन्द्र और एक कन्या जिसका नाम था भुवन मोहिनी । इस प्रकार इनके
वंशधर बंगाल, कलकत्ता एवं श्रीवृन्दावन में सर्वत्र छा गये और महाप्रभु की शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया। शृंगारवट वृन्दावन के निवासी गोस्वामिवृन्द सब इन्हीं के वंशधर हैं। इन्होंने समग्र श्रीमद्भागवत का पुनरानुवाद किया जो दो भागों में शकाब्द १२६५ में मुद्रित हुआ था।

   श्रीवीरभद्र गोस्वामी की अनेक अद्भुत लीलायें हैं। एक बार आप विष्णुपुर में पधारे। वहाँ के राजा वीरहाम्बीर ने इनका अति आदर-सम्मान किया और अपने सौभाग्यों की सराहना करते हुए इन्हें अपने भवन में ठहराया। राजा इनके रूप सौन्दर्य एवं तेज को देखकर इन्हें गौरांग रूप में देखने लगा। श्रीनिवासाचार्य खेतरि ग्राम में निवास करते थे। उन्होंने जब सुना कि गोस्वामी श्रीवीरभद्र प्रभु विष्णुपुर में आये हैं तो वह इनके चरणों में उपस्थित हुए। अति विनयपूर्वक श्रीआचार्य इन्हें अपने घर पर ले आये।मिष्टान्न सहित प्रभुपाद को जल-पान कराया और रसोई तैयार करने के लिए रसोई में जाने की आज्ञा माँगी। श्री गोस्वामिप्रभु बोले, 'तुम्हारी कनिष्ठा पत्नी ही आज रंधन करेगी।” श्री आचार्य ने जब अपनी पत्नी पद्मावती को प्रभु की आज्ञा सुनाई तो वह आनन्द से फूली न समाई। उसने सामने आकर प्रणाम किया और फिर रसोई बनाने के लिए चली गई। रसोई तैयार होने पर भगवान् को भोग अर्पण किया गया। श्रीवीरचन्द्र ने अपनी दक्षिण और आनिवास आचार्य को बैठाया और आनन्द पूर्वक प्रसाद आरोगने लगे। भोजन करते जाते थे और परस्पर श्रीगौरकृष्ण-लीला का वर्णन करने के बाद श्रीआचार्य ने श्रीगोस्वामी प्रभु को पुष्प माला, चन्दन, ताम्बूल अर्पण किया। श्रीगोस्वामी प्रभु ने श्रीवासाचार्य से कनिष्ठा पत्नी पद्मा के सम्बन्ध में पूछा। श्रीआचार्य बोले-प्रभो ! आप तो अन्तर्यामी है।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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