79
*श्रीनिताई चाँद*
7⃣9⃣
*प्रभुपाद श्रीवीरचन्द्र गोस्वामी*
श्रीगोस्वामी प्रभु ने श्रीवासाचार्य से कनिष्ठा पत्नी पदमा की सन्तान के सम्बन्ध में पूछा। श्रीआचार्य बोले-प्रभो ! आप तो अन्तर्यामी हैं, मैं क्या कहूँ, इसके गर्भ से लंगड़ी व कुबड़ी सन्तान होती है एवं जीवित नहीं रहती। श्रीप्रभुपाद हँस पड़े और बोले-“आचार्य ! अब इसका जो पुत्र होगा वह अति सुन्दर होगा। उसके वंशधर समस्त देश में व्याप्त होकर वैष्णव-धर्म का प्रचार को आज से इसका नाम 'गौरांग-प्रिया’ हम रखते हैं। इतना कहकर अपना प्रसादी पान उसे प्रदान किया। अपने प्रसादी पान के द्वारा ही ऐसी अदभुत शक्ति का संचार किया कि समय पर अति सुन्दर पुत्र का जन्म
हुआ जो गोविन्दगति नाम से प्रसिद्ध हुआ। बड़े होने पर उसे लाकर आचार्य प्रभु ने श्री गोस्वामी के चरणों में समर्पित किया और मन्त्र दीक्षा देने की प्रार्थना की। परन्तु गोस्वामिपाद ने श्रीआचार्य को ही अपने पुत्र गोविन्दगति को दीक्षा देने की आज्ञा दी। गोविन्दगति अति पण्डित और तेजस्वी हुए।इनके पौत्र श्रीराधामोहन द्वारा वीररत्नावली' एवं जानहवा–तत्वममार्थ ग्रंथो की रचना हुई।
एक बार फाल्गुन पूर्णिमा के अवसर पर खेतरि में एक महासभा का आयोजन किया गया, जिसमें अनेक गौड़ीय भक्त सम्मिलित हुए। श्रीश्यामानन्द प्रभु, श्रीनरोत्तम ठाकुर, श्रीनिवासाचार्य,श्रीअच्युतानँद, श्रीकृष्ण मिश्र, श्रीगोपाल यादव, माता श्रीवसुधा , श्रीजान्ह्वा , गंगादेवी एवं गोस्वामी श्रीवीरचन्द्र वहीं पधारे। श्रीगोस्वामिपाद ने उस महासभा में वैष्णव-धर्म के महत्व को प्रकाशित करते हुए कहा-
*गाणपत्यं तथा सौर शैवं शक्तमिति क्रमात् ।।*
*एतेषां सर्वधर्माणां प्रधानं वैष्णवं मतम् ।।*
अनेक मत हैं, कोई गणेश जी की उपासना करते हैं, कोई सूर्य के उपासक हैं, कोई शिवजी की तथा कोई देवी की उपासना करते हैं। परन्तु इन समस्त धर्मों में वैष्णव धर्म-श्रीकृष्ण उपासना ही सर्वश्रेष्ठ है। उन्होंने कहा-अवैष्णव गुरु से कभी भी दीक्षामन्त्र नहीं लेना चाहिए। श्रीकृष्ण-मन्त्र ही समस्त मन्त्रों में प्रधान है, वह भी सम्प्रदायी-वैष्णव से ग्रहण करना चाहिए।इस प्रकार वैष्णव धर्म की अनेक शिक्षा प्रदान करने के बाद वहाँ नाम संकीर्तन आरम्भ हुआ। जिसमें श्रीरूपनारायण ने गान आरम्भ किया। दोनों भुजाये उठाकर गोस्वामी प्रभु नृत्य करने लगे और उन्होंने श्रीरूपनारायण को आलिंगन कर लिया। श्रीरूपनारायण प्रभु के चरणों में गिर पड़ा। प्रभु ने उसके शीश पर अपना चरण धर दिया एवं उसे 'गोस्वामी' पदवी प्रदान की यह कहते हुए कि तुम में श्रीरूप गोस्वामी पद की शक्ति का संचार है।
श्रीखण्ड में ठाकुर श्रीनरहरि का अन्त्येष्टि महोत्सव जब मनाया जा रहा था, वहीं समस्त गौड़ीय भक्त एकत्र हुए। श्रीवीरचन्द्र गोस्वामी भी वहां पधारे।सबने श्रीनाम संकीर्तन प्रारम्भ किया। तुमुलध्वनि से आकाश-पाताल गूंज उठा। भक्तगण दोनों भुजायें उठा-उठाकर नृत्यपूर्वक गान करने लगे।
क्रमशः
श्रीगुरुगौरांगो जयते !!
Comments
Post a Comment