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क्रम: 8⃣
             
      🌹श्री पंडित जी ने केवल अपने ही नहीं, समस्त परिजन, ग्राम वासियों के प्राण प्रियतम श्रीनिताई चांद को उस सन्यासी महोदय के हाथों सौंप दिया और मस्तक नवाकर नेत्रों से अजस्त्र अश्रुधारा भागते हुए चुप खड़े रह गए। श्रीनिताई चांद ने यह नहीं पूछा कि मुझे कहां भेज रहे हो। सन्यासी उनको लेकर वहां से चल दिया। पंडित जी मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। पद्मावती एवं पंडित जी के विलाप वचन सुनकर पाषाण भी पिघल गए। धीरज भी अधीर हो उठा,  मनुष्यों की तो बात ही क्या है ?
           
        🌸श्री निताई चांद आनंदपूर्वक चले गए, मुंह फेरकर भी पीछे की ओर नहीं देखा। सच्ची बात है -माया- बंधन से परे महत पुरुषों के हृदय जब कठोरता धारण करते हैं तो व्रज भी लज्जित हो जाता है और जब कोमलता व्यक्त करते हैं तो फूलों की कोमलता कैसे लेखे?  उनकी लीला, चेष्टा एवं आचरण को प्राकृत बुद्धि वाले कैसे भी नहीं जान सकते हैं-

व्रजादपि  कठोराणि मृदुनि कुसुमादपि।
लोकोतराणा चेतांसि को हि विज्ञातुमीशवर

कलियुग जीवो की अतिशेष दयनीय दशा कृष्ण बहिमुखता को देखकर श्री निताई चांद का हृदय व्याकुल हो चुका था,  कोमलता- करुणा उछल पड़ी थी, परिजनों का त्याग करने में सचमुच उनका हृदय व्रज से भी अधिक कठोर हो गया था। सब छोड़ कर चल ही दिए उस सन्यासी के साथ, माता -पिता परिजन एवं ग्राम निवासियों को विरहानल की तीव्र ज्वाला में जलता हुआ। श्रीहाड़ाई पंडित पागल हो गए। तीन मास पर्यन्त अन्न ग्रहण न किया। किंतु श्रीनिताई चांद के अनुराग के अचिन्त्य  प्रभाव से उनका जीवन बना ही रहा।

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