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*श्रीनिताई चाँद*
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*प्रभुपाद श्रीवीरचन्द्र गोस्वामी*
श्रीखण्ड में ठाकुर श्रीनरहरि का अन्त्येष्टि महोत्सव जब मनाया जा रहा था, वहाँ समस्त गौड़ीय भक्त एकत्र हुए। श्रीवीरचन्द्र गोस्वामी भी वहाँ पधारे।सबने श्रीनाम संकीर्तन प्रारम्भ किया। तुमुलध्वनि से आकाश-पाताल गूंज उठा। भक्तगण दोनों भुजायें उठा-उठाकर नृत्यपूर्वक गान करने लगे। सबके बीच नाच रहे थे गोस्वामी श्रीवीरचन्द्र प्रभुपाद । अद्भुत नृत्यभंगी, सात्विक विकारों से समस्त अंग विभूषित थे। असंख्य लोग उस नृत्य को देख-देखकर
आश्चर्य चकित हो रहे थे।
वहाँ एक रामाई नाम का व्यक्ति भी उपस्थित था, जो जन्म से अन्धा था।नाम ध्वनि सुन-सुनकर वह आनन्द ले रहा था। परन्तु गोस्वामी पाद के नृत्य को वह कैसे देखता ? लगा करने महाक्रन्दन वह रामाई दोनों हाथों से अपने नेत्रों को पकड़कर 'हाय, हाय' करने लगा। "हाय हाय” मैं कृष्ण संकीर्तन नृत्य नहीं देख पाता। किस अपराध से विधाता ने मेरे नेत्र हरण कर लिए'–ऐसा कह–कहकर चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगा। परम कृपालु श्रीवीरचन्द्र ने जब उसकी यह दशा देखी तो उनसे रहा न गया। नृत्य करते-करते उसी के पास पहुंचे और उसके नेत्रों पर अपने हाथ को फेरा । बोले, रामाई ! देख तो कैसा नृत्य-गान हो रहा है।” इतना कहते ही रामाई के नेत्र खुल गये और वह जन्म का अन्धा सब कुछ देखने लगा। समस्त भक्तों के आनन्द की सीमा न रही। प्रभुपाद के चरणों में वह गिर पड़ा और अनेक समय तक उनकी स्तुति गान करता रहा। प्रभु ने उसे आत्मसात् कर लिया। इस प्रकार प्रभुपाद ने अनेक जीवों को प्रेमभक्ति प्रदान कर उनका उद्धार किया। इनके वंशज विस्तार से भारतवर्ष के कोने-कोने में श्रीश्रीमन्महाप्रभु के चरितों एवं उनके द्वारा प्रचारित प्रेमभक्ति धर्म का पर्याप्त प्रचार हुआ। इनके शिष्यों द्वारा फिर पञ्जाब, बलोचिस्तान, अफगानिस्तान तक वैष्णवमत का प्रचार एवं श्रीश्रीमनमहाप्रभु विग्रह स्थापन–सेवा आदि का प्रचलन हुआ।
क्रमशः
श्रीगुरुगौरांगो जयते !!
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