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*श्रीनिताई चाँद*
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*श्रीगदाधरदास*
श्रीगदाधरदास की गणना श्रीमन्महाप्रभु एवं श्रीनिताईचाँद इन दोनों की शाखाओं में हैं। कलकत्ता के चार कोस उत्तर में भागीरथी के तीर स्थित एडिदय ग्राम के ये निवासी थे। पहले तो यह श्रीमन्महाप्रभु के निकट पुरीधाम् में रहते थे। किन्तु श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु जब श्रीमन्महाप्रभु के आदेश से गौड़देश में प्रेम भक्ति प्रचार के लिए पधारे, तो उनके साथ ये भी गौड़ देश चले आए।
एक दिन श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु ने इनके घर दानलीला की। श्रीनिताईचाँद बने ब्रजराज और अनेक भक्तों ने अपने को ब्रजगोपियों के रूप में सजाया।उन्होंने सिर पर दूध-दही की मटकियाँ रखीं। कोई दही लेओ री दही, "कोई दूध लेओ री दूध”–की मधुर ध्वनि करते हुए शोभा पाने लगा। श्रीनिताईचाँद स्वरूप ब्रजराज अनेक सखाओं के साथ उनका मार्ग रोक कर उनसे दान मांगने लगे। अनेक विधि रसमय कथोपकथन कर श्रीकृष्ण की ब्रजलीला का अनुकरण किया एवं रस विभोर हो गए।
श्रीगदाधरदास जिस ग्राम में निवास करते थे, वहाँ का यवन काजी इनके कीर्तन से बड़ा द्वेष करता था। एक दिन ये प्रेमोन्मत्त होकर अकेले ही रात के समय 'हरि-हरि' ध्वनि करते काजी के घर जा पहुँचे। उसके दरवाजे पर जाकर बोले-“कहाँ है बेटा काजी ! बाहर निकल” काजी इनकी ललकार सुनकर बड़ा क्रोधित होकर बाहर निकल आया। उसे देखते ही इन्होंने कहा-“या तो तू ‘कृष्ण-कृष्ण' 'हरि-हरि' बोल नहीं तो अभी तुम्हारा मस्तक काटे देता हूँ।” इनके तेज और आवेश को देखकर नत मस्तक होकर काजी इनके चरणों पर गिर पड़ा और हाथ जोड़कर बोला, गदाधरदास ! क्या आज्ञा है मेरे लिए ? इतना क्रोध क्यों। इन्होंने कहा-“देख श्रीश्रीगौर-नित्यानन्द की कृपा से सबके मुख से हरि-हरि नाम ध्वनि सुनी जाती है, केवल तुम बच रहे हो।तुम्हारे मुख से श्रीहरिनाम बुलवाने आया हूँ। तुम हरि हरि बोलो, मैं तुम्हें समस्तस पापों से मुक्त कर दूंगा। काजी मुसकरा कर बोला गदाधर !अच्छा मैं कल हरि-हरि बोलूंगा अब रात्रि समय तुम घर लौट जाओ।श्रीगदाधर नाचने लगे और बोले, कल क्या बोलेगा, अभी तूने हरि हरि तो बोल ही दिया है, इतना ही पर्याप्त है-इससे तुम्हारे समस्त पाप दूर हो गए हैं। इतना कहकर उन्मत्त होकर नृत्यगान करते हुए अपने घर लौट आए। तब
से काजी ने हिंसा, संकीर्तन से विद्वेष का त्याग कर दिया और सब वैष्णव स्वच्छन्द होकर ग्राम में नाम संकीर्तन करने लगे।
आज भी एड़ियादह ग्राम में श्रीगदाधरदास का देवालय, दानलीला क्षेत्र, आंगन एवं उनकी समाधि वेदी विद्यमान है। व्रजलीला में यह श्रीराधाविभूति चन्द्रकान्त व पूर्णानन्दा गोपी थे।
*राधाविभूतिरूपा या चन्द्रकान्तः पुरा स्थितः ।*
*साद्य गौरांगनिकटे दासवंश गदाधरः ।।*
*पूर्णानन्दां व्रजे यासीद् बलदेव प्रियाग्रणी।*
*सापि कार्यवशादेव प्राविशत्तं गदाधरम् ।।*
गौरगणोद्देशदीपिका १५४-१५५
व्रज में श्रीराधिका की भूषणरूपा जो चन्द्रकान्ता थी, वह अब श्रीगौरांग के निकट गदाधरदास आकर प्रकट हुए। ब्रज में श्रीबलराम की प्रियतमा जो पूर्णानन्दा थी, वह भी कार्यवश गदाधर में आकर प्रविष्ट हुई।
क्रमशः
श्रीगुरुगौरांगो जयते !!
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