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*श्रीनिताई चाँद*

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*श्रीमुरारी चैतन्यदास*

  ये श्रीमननित्यानंद प्रभु के प्रधान शिष्यों में थे। ये खड़दह ग्राम में निवास करते थे। इनका प्रसिद्ध नाम श्रीचैतन्यदास ही था। श्रीकृष्ण प्रेम में निरन्तर आविष्ट रहते थे। इन्हें बाहर की, यहाँ तक कि शरीर की भी सुध-बुध न रहती थी।

   एक बार प्रेमाविष्ट होकर यह निर्जन वन में निकल गए। वहाँ एक व्याघ सामने से भागता हुआ इनकी ओर झपटा। इन्होंने उसका कान पकड़ कर उसे एक थप्पड़ जमा दिया। व्याघ्र इनका स्पर्श पाते ही अपने हिंसक स्वभाव को भूल गया। यह उस पर घोड़े की तरह सवार होकर ग्राम लौट आए।ग्रामवासी भयभीत हो उठे। परन्तु इन्होंने सबको आश्वासन दिया और व्याघ्र
से उतर कर उसे वन की तरफ जाने का आदेश किया।सबके देखते-देखते वह भी प्रेम में झूमता हुआ वन में चला गया। ऐसी कृपा शक्ति थी श्रीनिताईचाँद की इन में। व्याघ्र से निर्भय होकर अनेक खेल खेलते थे।

    ऐसे ही एक दिन न जाने कहाँ से एक महा अजगर सर्प उठाकर अपने गले में डाल लाए, जिसकी हुंकार और श्वास मात्र से जीव विष से प्रभावित होकर मर जाते ऐसे सर्प को गले में डालकर कृष्ण-कृष्ण कहकर श्रीचैतन्यदास नाचने लगे, चारों ओर नर-नारियों की भीड़ जुड़ गई। ऐसे अद्भुत अनेक चरित्र हैं इनके। दो-दो तीन-तीन दिन नदी के जल में ही डूबे रहते किन्तु शरीर में कुछ भी विकार न आता था। इन्हें कृष्ण प्रेम में सदा आत्मविस्मृति रहती थी। सदा आनन्दमय वाणी ही बोलते थे। प्रायः जड़वत् रहते थे। इनकी वेशभूषा भी अद्भुत होती थी-व्यवहार तो था ही। श्रीवृन्दावनदास जी ने श्रीचैतन्य भागवत में लिखा है, इनकी शरीर-स्पर्शी वायु के स्पर्श हो जाने पर भी श्रीकृष्ण भक्ति की प्राप्ति हो जाती थी।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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