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*श्रीनिताईचाँद*

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*प्रभुपाद गोस्वामी श्रीप्रेमानन्द जी*

    दूसरे दिन श्रीगोस्वामिपाद ने उतने ही टीन धी मंगाकर श्रीयमुना जी के अर्पण कर
दिये। इतनी सिद्धियों रखते हुए भी वे अपने को छिपा कर रखते और कभी भी अपनी प्रतिष्ठा नहीं चाहते ।

   ग्वालियर के राजा ने आपके आगे मणि-मोतियों का भरा हुआ सोने का थाल भेंट में रखा। आप यमुना किनारे ही बैठे थे, राजा के सामने ज्यों का यमुना में उलटा डाल दिया। राजा का हृदय में अत्यन्त खेद हुआ। उसका मन-मलिन देखकर आप यमुना में कूद पड़े और फिर भराभराया थाल लेकर
सामने रख दिया। राजा के आश्चर्य की सीमा न रही।चरणों में पड़कर क्षमा याचना की और बहुत से गाँव श्रीनिताईचाँद की सेवा के लिए दान में दिये।यह बात अति प्रसिद्ध है कि मनों चावल-गेहूँ, साग-फल आपके आगे भेंट में प्रति दिन ढेर लग जाते । ब्रजवासी ब्राह्मण एवं महात्मा लोग आते और आप
उन्हें सब दे देते।

    ऐसे उनके अनेक चरित्र सुनने में आते हैं। और अनेकों को कोई जानता भी नहीं है। आपका अटूट विश्वास एवं दृढ़ श्रद्धा थी श्रीनिताईचाँद के चरणों में। डेरागाजी खाँ के सेवकों ने एक चित्रकार को पाँच सौ रुपये देकर इस बात के लिए तैयार किया कि वह वृन्दावन जाकर प्रभुपाद का एक चित्र बना लावे । वह वृन्दावन आया और नित्य आपके सामने टकटकी लगा कर थोड़ी दूर बैठा रहता और चित्र बनाता रहता। अनेक दर्शक प्रति दिन आते-जाते, प्रभुपाद ने कभी कुछ ध्यान भी नहीं दिया। जब ध्यान पूर्वक उसे देखा तो आपने उसे निकट बुलाकर सब बात पूछी। उसने सब बता दिया। आपने पूछा-“चित्र तैयार हो गया ?" उसने बताया कल बिल्कुल तैयार हो जायगा।दूसरे दिन वह दिखाने के लिए लाया। आपने चित्र अपने पास रख लिया और नकद पाँच सौ देकर उसे देश में वापस कर दिया यह कहकर कि चित्र तो श्रीनिताई-गौर का, श्रीराधाकृष्ण का संग्रहणीय है, न कि हमारा। हमारे सेवकों को हमारी यह आज्ञा सुना देना।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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