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*श्रीनिताई चाँद*

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*प्रभुपाद गोस्वामी श्रीदेवकीनन्दनजी महाराज*

*जय जय जय प्रभु देवकीनन्दन।*
*वृन्दावन-सुख-रस-मराल मनु, मधुकर चरणकमल-व्रजचन्दन ।।*
*प्रेम-भक्तिरस-राशि कृपामय, उर धरि ध्यान करू पग वन्दन ।*
*श्यामदास नित लहि शरणागति, याचत रतिपद यशुमतिनन्दन।।*

   प्रभुपाद श्रीनिताईचाँद से ग्यारहवीं पीढ़ी में प्रभुपाद श्रीयशोदानन्दन गोस्वामि के घर आप पुत्ररूप में आविर्भूत हुए। श्रीवृन्दावन-शृंगारवट के ही नहीं, तत्कालीन समस्त भजनानन्दी महानुभावों के आप श्रृंगार-शिरोमणि थे।
  
       जगत की ओर से तो इन्होंने मौन धारण कर रखा था किन्तु श्रीनिताई-गौर-नाम,
श्रीकृष्णनाम रटते रटते कभी विश्राम न लेते थे। वैराग्य, दीनता, सहिष्णुता इनके स्वाभाविक गुण थे। इनकी प्रेम-भक्ति, नाम निष्ठा, नाम-रुचि अदभुत थी। भारतवर्ष के असंख्य व्यक्ति गुरुदीक्षा लेकर आपके शरणापन्न हुए, किन्तु किसी से भी कुछ सेवा लेने की कामना नहीं थी, किसी के आगे अपनी विद्या, भजन-सिद्धि की बात भूलकर भी प्रकाशित नहीं होने देते थे। इनकी विशुद्ध
सात्विक प्रकृति तथा भजन-निष्ठा को जानकर उस समय के समस्त महापुरुष स्वयं किसी को दीक्षा-शिक्षा न देकर इनकी शरण में भेज दिया करते थे। यह बात प्रसिद्ध है कि सिद्ध पण्डित बाबा श्रीरामकृष्णदास जी के पास कोई दीक्षा के लिए जाता, तो उसे वह सीधा इनके पास ही दीक्षा लेने की प्रेरणा करते।

श्रीललितलडैती जी ने लिखा है-
*जय जय जय श्रीदेवकीनन्दन ।*
*जगत ओर से मौन धरी जिन, निशिदिन रटत यशोदा नन्दन ।।*
*प्रेम भक्ति की खानि मनोहर, उर धरि ध्यान करूँ पग वन्दन।*
*ललितलडैती दरस किए जिन दूर होत तछिन भव-बन्धन ।।*

    श्रीगौरांगदास बाबा (श्रीधीरेन्द्र) जब गृहत्याग कर कलकत्ता से भाग कर वृन्दावन आए और बाबा श्रीरामदास जी को पता लगा कि धीरेन्द्र वृन्दावन गया है तो आपने इन्हीं श्रीगोस्वामिपाद को पत्र दिया था कि आप उसकी खोजकर उसे अपने पास आश्रय देवें। उसे भजन-शिक्षा देकर एक आदर्श भक्त जीवन की प्रेरणा देवें। श्रीगोस्वामिपाद ने श्रीधीरेन्द्र (बाबा श्रीगौरांगदास जी) को लगभग ६ माह अपने पास रखा और यथेष्ट भक्ति मार्ग की शिक्षा दी।

     श्रीनामसंकीर्तन में ऐसा आवेश और सात्विक भावों का ऐसा प्रचण्ड वेग भाव में उदित हो उठता था कि बहिर्मुख लोगों की तो क्या बात, इस विषय को जानने वाले महापुरुष भी मुँह में अंगुली दे जाते थे। इनके कम्प, पुलक चीत्कार, प्रचण्ड हुँकार को श्रवण करते ही अनेक व्यक्ति सात्विक विकारों में डूब जाते थे। नामसंकीर्तन में 'हा निताई'-'हा निताई' कड़ते जब पछाड़ें खाते तो घण्टों मूर्छित अवस्था मे पड़े रहते।दिल धड़क उठते दर्शकों के।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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