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*श्रीनिताई चाँद*

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*प्रभुपाद गोस्वामी श्रीदेवक़ीनन्दनजी महाराज*

    आप एक बार अपने सेवकों के आग्रह पर कलकत्ता पधारे। इनके शिष्य बाबा स्वरूपदास सूरज मन्दिर वाले सेवा के लिए साथ गए। अपने सेवक के घर रात्रि में जब कीर्तन का आरंभ हुआ तो आप अपने भावों का संवरण न कर सके। उठकर उदण्ड नृत्य करने लगे और हा निताई ! हा गौर ! कहते पुकारते पछाड़ खाकर बेसुध हो गए। सारी रात आप उस अवस्था मे पड़े रहे। कीर्तन होता रहा परन्तु आपको कुछ चेतनता न आई। इसी बीच वहाँ जुड़ी भीड़ में एक युवक को इनकी यह अवस्था देखकर ऐसा लगा कि यह कपट-मूर्छा है, दम्भ है और कुछ नहीं। उस दुष्ट ने एक सुई लेकर गुप्त रूप से इनके शरीर में अनेक जगहों पर चुभो दी। परन्तु यह नशा क्या सुइयों से उतरने का था ?लज्जित होकर वह तो अपने घर चला गया। रात्रि को उसके पिता-माता को स्वप्न में अवधूत शिरोमणि श्रीनिताईचाँद ने अत्यन्त क्रोधित रूप में दर्शन देकर कहा-"तुम्हारे लड़के ने मेरी प्रिय सन्तान को इस प्रकार सुइयों में गोद डाला है। प्रातः होते ही उस महत् अपराध का प्रायश्चित्त करो, नहीं तो दो दिन के अन्दर तुम्हारा सर्वनाश कर दूंगा।"

      सवेरे उठते ही पिता ने अपनी जगह और माता ने अपनी जगह लड़के से इस विषय में पूछा। वह युवक भय के मारे काँप उठा और आश्चर्य में पड़ गया कि माता, पिता दोनों को मेरी उस करतूत का कैसे पता लगा। स्वप्न की बात बताकर वे अपने लड़के को श्रीगोस्वामिपाद के चरणों में ले आए। समस्त परिवार ने अति दीनता पूर्वक क्षमा याचना की। आप मुस्कराते हुए कहते रहे कि “मुझे तो कहीं सुई नहीं चुभी, न दर्द है। आप पर श्रीनिताईचाँद की अहैतुकी कृपा है।" वह युवक एवं समस्त परिवार श्रीगोस्वामिपाद के चरणाश्रित होकर धन्य हो गया।

    श्रीस्वरूपदास की (पूर्व आश्रम सम्बन्ध की) सास वहाँ कलकत्ता में उस स्थान से थोड़ी दूर ही रहती थी और वह उन दिनों विकराल रोग में अनेक दिनों से ग्रस्त थी, जीवन की आशा न थी। यह जानकर श्रीस्वरूपदास उसे एक दिन समय पाकर देखने के लिए चला गया। देखा कि वह तो अन्तिम सांस ले रही हैं। चारों ओर से बन्धु-बान्धव क्रन्दन कर रहे हैं। अत्यन्त दयनीय दशा है उन सब की। श्रीस्वरूपदास को देखते ही सब और भी अधीर हो उठे और "किसी प्रकार इसे बचाओ-इसे बचाओ, तुम तो भगवान् के भगत हो, तुम इसकी रक्षा करो तुम भले आये-"ऐसे अनेक वचन कहकर रोने-चिल्लाने लगे।
श्रीस्वरूपदास का हृदय भी दुःखी हो उठा उन सब की अवस्था देखकर। कुछ भी न बोलकर श्रीगोस्वामी जी के पास लौट आया। आपने उसका मुख मलिन देखकर उसका कारण जानना चाहा, तो उसने सब वृत्तान्त कह सुनाया आप बोले -"स्वरूपदास ! वैसे तो उसका अन्तकाल आ गया है, यदि तुम उसे अपने एकादशी व्रत का फल दान में दे दो तो वह बच सकती है। जितनी एकादशी व्रतों का फल दोगे, उतने वर्ष और जी जायगी।" श्रीस्वरूपदास आपके वचन सुनकर झट वहाँ लौट आये और हाथ में जल लेकर ११ एकादशी व्रतों के फल का संकल्प कर उसके हाथ में छोड़ दिया। जादू कहा जाय या करिश्मा ! या निताईचाँद के वंशोद्भव प्रभुपाद की
अलौकिक शक्ति ? जल हाथ में देते ही उस रोगिन का रंग पलटा।श्वास-निश्वास की गति में सुधार होने लगा। चेतनता लौटती आई, उसने आँखें खोल दी। दो-चार दिन में पूर्ण निरोग हो गई और वह ११ वर्ष तक जीवित रही। उसने यह सब वृत्तान्त जानकर श्रीगोस्वामिपाद के चरणों में आत्म -समर्पण कर दिया। वैष्णव दीक्षा लेकर स्वयं एकादशी व्रत करने लगी और ११ व्रतों का फल पुनः श्रीस्वरूपदास को विधिवत् लौटा दिया-यह सब वृत्तान्त श्रीस्वरूपदास ने स्वयं लेखक को सुनाया। साथ ही निर्जला एकादशी व्रत कराकर लेखक को निमित्त बनाकर उसके फल का प्रत्यक्षीकरण कराया असंख्य नर-नारियों को, श्रीगौरांग मन्दिर डेरागाजी खान में । उस समय क्या घटना घटी और कैसे श्रीगोस्वामिपाद के सुपुत्र गोस्वामी श्रीश्यामानन्द प्रभु ने उसे सम्भाला-यह सब जानते हैं लेखक के श्रीपिता जी और अनेक संकीर्तनकर्ता जो उस समय मन्दिर में उपस्थित थे, अस्तु।

    प्रसंगवश यह भी उल्लेखनीय है लेखक के श्रीगोस्वामीपाद महाराज के
चरण-आश्रित होने के ३ वर्ष बाद आपके सुपुत्र प्रभुपाद श्रीश्यामानन्द गोस्वामी इन्हीं बाबा स्वरूपदास के साथ शहर डेरागाजी खान में पधारे थे, क्योंकि गौड़ीय सम्प्रदाय के गोस्वामी श्रीश्यामदास जी (जिनका चरित्र आप आगे देखेंगे) के समस्त वंशज गोस्वामिवृन्द इसी वंश और घराने के शिष्य थे, अतः श्रृंगारवट के गोस्वामी प्रभुपाद वहाँ शिष्यों की साग्रह प्रार्थना पर दो-चार वर्ष
बाद आया-जाया करते थे। गोस्वामी श्रीरोहिणीनन्दन प्रभुपाद ने तो वहीं नित्य लीला में प्रवेश किया। उनकी समाधि भी वहाँ प्रतिष्ठित की गई थी।

   इन्हीं दिनों श्रीसनातन धर्म सभा के विशाल हाल में श्रीहरिनाम संकीर्तन
मण्डल की ओर से एक संकीर्तन आयोजन किया गया।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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