104
*श्रीनिताई चाँद*
1⃣0⃣4⃣
*प्रभुपाद गोस्वामी श्रीदेवकीनन्दनजी महाराज*
इन्हीं दिनों श्रीसनातन धर्म सभा के विशाल हाल में श्रीहरिनाम संकीर्तन मण्डल की ओर से एक संकीर्तन आयोजन किया गया, जिसमें गास्वामी श्रीश्यामानन्द प्रभुपाद पधारे आप जब वहाँ एक विशाल मंच पर विराजमान होकर श्रीनाम की महिमा का बखान कर रहे थे, तो हा-निताई हा गौर उच्चस्वर में उच्चारण करते ही आपके शरीर में इतना कम्प और पुलक हो उठता कि अपने-आप शरीर बालिस्त भर ऊँचा उछल पड़ता और जनता की ओर पीठ हो जाती एवं दीवार की तरफ मुख। एक बार नहीं तीन चार-बार ऐसी अवस्था प्रभुपाद की देखकर वहाँ की जनता चकित एवं रोमाञ्चित हो उठी। उन दिनों अनेकों ने उनके पदाश्रित होकर श्रीनिताईचाँद की कृपा प्राप्त की। वक्तव्य यह है कि श्रीगुरुदेव प्रभुपाद की सन्तान में भी ऐसे सात्विक विकार प्रकट हो उठते थे।
एक बात प्रभुपाद श्रीगुरुदेव स्वयं भी पुराने डेरागाजी खान नगर में पधारे
थे, अपना सौभाग्य मान नगर के असंख्य नर-नारी गो० श्रीश्यामदास वंशज गोस्वामि वृन्द के साथ आपके स्वागत के लिए नगर से ५ मील दर सिन्धु नदी तट पर पहुँचे। स्टीमर से उतार कर आपको दो घोड़ों की सजी हुई बग्धी में विराजमान कर नाम-कीर्तन करते हुए निवास स्थान पर लाया गया। श्रीनिताईचाँद के वंशज एवं भगवत् तुल्य जानकर इनकी विधिवत आराधना होती रही। स्वर्ण-जटित विशाल हिंडोले में आपको झुलाया गया।तब से डेरागाजी खान नगर में आपके प्रति अक्षुण्ण श्रद्धा एवं अनुराग चला आता था।
इसलिए पूज्य पिताजी मुझ अधम को भी आपके चरणाश्रित करने के लिए सन् १६३८ मार्च कुम्भ के अवसर पर वृन्दावन ले आए। इस अधम ने सर्व प्रथम (दीक्षा से एक दिन पहले) आपके जिस अवस्था में दर्शन किए अति विचित्र थी, रोमांचकारी थी। उस दिन सन्ध्या के समय श्रीनिताई-गौर की शोभायात्रा श्रृंगारवट से निकल कर नगर में भ्रमण कर रही थी। हम लोग उसके दर्शन करने के लिए ज्यों ही गोपेश्वर रोड पर पहुँचे, तो क्या देखते हैं कि श्रीनिताई-गौर सुन्दर का अति शोभायमान डोला कुछ एक वैष्णवों के कन्धों पर सुशोभित है, उसके आगे उद्भट नृत्य करते हुए वैष्णव भाव विभोर होकर संकीर्तन कर रहे हैं। खोल करतालों की तुमुल ध्वनि के साथ गोलाकार घूम रहे हैं। इनके बीच कुछ वैष्णव कन्धों पर एक धूल-धूसरित वस्त्र पहने किन्हीं व्यक्ति को उठाये हुए हरि बोल-हरि बोल हरि-बोल करते नाच रहे हैं, चारों ओर नर-नारियों की भीड़ किन्तु सबकी दृष्टि एक मात्र उन्हीं पर केन्द्रित थी। कोई ऐसा व्यक्ति नहीं दीखता था जो सिसक-सिसक कर रोते-रोते आँसू न बहा रहा हो। हम सबके लिए एक नया दृश्य था, चिन्तातीत घटना थी, आश्चर्य में भरकर जब ताऊजी, पिताजी ने पूछा कि ये वैष्णव जिसको उठाकर नाच रहे हैं ? कौन है यह, क्या हो गया इसे?
पैरों तले की धरती निकल गई जब किसी ने कहा ये श्रृंगारवट के गोस्वामी श्री-हैं, नाम-प्रेमावेश में बहुत देर से मूर्छित चले आ रहे हैं-अतः वैष्णव इन्हें कन्धों पर उठा ले चल रहे हैं। सबका धीरज टूट गया, मेरे चाचा श्रीप्रीतमदास मेरा हाथ पकड़ कर उस भीड़ में मुझे खींच ले गए। उन्होंने झट उनके नीचे कन्धा लगा दिया एवं मैंने भी उनके एक चरण को पकड़ लिया, जिसे चार-चार छ:-छ: वैष्णव पकड़ने के बहाने इनके श्रीचरण का स्पर्श-सौभाग्य प्राप्त कर रहे थे। हाय ! हाय !! खोल-करताल की हर चोट के साथ-साथ इनके चरण-टांगें, इनके हाथ भुजाएँ, गर्दन–सिर निरन्तर पटक सी खा रहे थे। बल पूर्वक पकड़ने पर भी वह हिलन न जा रही थी। आश्चर्य की सीमा न रही जब हमने देखा कि इनका प्रति रोम, इनकी एक-एक नस नाड़ी *हरिबोल हरिबोल* की आवाज के साथ नाच रही थी।
क्रमशः
श्रीगुरुगौरांगो जयते !!
Comments
Post a Comment