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*श्रीनिताई चाँद*

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*प्रभुपाद श्रीदेवकीनन्दन गोस्वामीपाद महाराज जी*

       श्रीगोपेश्वर महादेव मन्दिर के सामने प्रभुपाद को चेतनता आई और सबने इन्हें कन्धों से नीचे उतारा। दो वैष्णव उन्हें दृढ़ता पूर्वक पकड़ कर चलने लगे। आपके मुख से लार टपक रही थी, वस्त्र फट चुके थे, रज में सने हुए थे ,आपका सारा शरीर धूलि धुसरित हो रहा था। मैं इस भेष-आवेश को देखकर मन-मनमें विस्मित तथा कुछ भयभीत भी हो रहा था-"मुझे क्या इनसे दीक्षा लेनी है ? ये कैसे महापुरुष हैं ?" नितान्त मूर्ख था, अपरिचित था ऐसी अवस्था से। प्रेमावस्था तो क्या, भक्ति पथ से कोसों दूर था जैसे अब।

      कीर्तन के साथ-साथ श्रीप्रभुपाद का अनुगमन करते हुए हम श्रीलालाबाबू
मन्दिर के सामने आए। श्रीनिताई-गौर का सुन्दर डोला रोक लिया गया और सामने फिर गोलाकार में वैष्णव महामन्त्र उच्चस्वर से गान करते-करते नाचने लगे। प्रभुपाद को दृढता पूर्वक दो-तीन वैष्णव सम्भाले हुए थे। फिर में एकाएक जोर से उछलकर श्रीनिताई-गौर सुन्दर की ओर आप उच्च हुँकार करते हुए भागे और जाकर पृथ्वी पर गिरे, इनके दाँतों से रक्त बहने लगा,मस्तक पर चोट आई, जैसे-तैसे इनको उठाया।

     आँखों देखी घटना है कि इसी बीच आपके दर्शन कर एक बंगालिन माई दौड़ती हुई ब्रह्मकुण्ड के निकट गन्दी नाली में जा गिरी। कितना अद्भुत आवेश था? इसको जिन्होंने देखा है, अनुभव किया है, केवल वे ही इस रहस्य को जान सकते हैं, कितनी व्याकुलता, कितनी अधीरता और कितनी ललक एवं तड़प थी प्रभु को आलिंगन करने की?

   एक बार जब मैं श्रृंगारवट सन्ध्या के समय प्रभुपाद के दर्शन करने गया तो आप कहीं बैठे न मिले। पूछने पर गुरुमाता ने बताया कि उनको नीचे की कोठरी में सांकर लगाकर बन्द कर दिया गया है। आश्चर्य एवं दुःख की सीमा न रही। माँ ने कहा-"श्रीरामदास बाबा का आज संकीर्तन निकल रहा है, अमिय निमाई प्रभु के साथ। बेटा ! ये गए बिना मानते नहीं हैं और वहां जाकर आवेश में माथा फोड़े बिना नहीं रहते हैं।वस्त्र फाड़ कर पागलों की सी इनकी दशा हो जाती है, क्या करें हम ?" मैंने प्रार्थना करी “ऐसा मत कीजिए, मैं साथ जाता हूँ, दर्शन करा लाता हूँ।" मैं जानता था और देख चुका था दो वर्ष पहले इनके प्रेमावेश एवं प्रेमोन्माद को। फिर भी उनकी यह दशा मुझसे देखी न गई।

    मैंने सांकर खोली, आप पृथ्वी पर उलटे पड़े सिसक-सिसक कर रो रहे थे। देखते ही बोले-"आ गए तुम !" मैं तुम्हें ही देख रहा था। आप झट मेरे कन्धे पर हाथ रख श्रीबाबा के संकीर्तन में पधारे । बजाजा से हम निकले और शोभायात्रा अनाज मण्डी से आ रही थी। अधीर उठे संकीर्तन ध्वनि सुनते ही। ' मैं भी युवक था, संभला भी हुआ था। मैंने मजबूती से पकड़ रखा था। आप वयोवृद्ध थे। पर क्या कहूँ रायावाली गली पर पहुँचते ही आप मुझे झटका दे भागने में सफल रहे।

    कहाँ से आया वह बल ? किसकी थी वह शक्ति ? मैं पकड़ते-पकड़ते रह गया, आप देखते-दखते में वैष्णव मण्डली में जा मिले। उधर श्रीरामदास जी बाबा की भी तो यही प्रेमाविष्ट अवस्था थी। एक दूसरे को देखते ही आलिंगन कर दोनों पृथ्वी पर बहुत देर तक पड़े रहे , आँसुओं से सचमुच कीच
हो गई। 'हा निताई ! हा गौर ।इधर संकीर्तनियों का आवेश सागर उछलने लगा। बहुत देर बाद आप दोनों उठे। मैंने श्रीमहाराज को पीछे कमर से अपनी पूरी शक्ति से सम्भाला। उस समय उनके श्रीअंग की एक-एक धमनी धमाके से उछल-उछल कर नाच रही थी। मैं कुछ सुन न सका, किसी को देख न सका भय के कारण कि कहीं आप फिर पछाड़ खाकर चोट न खा जायें। बनखण्डी पर आते ही मैं वापस आपको खींच के ले गया शृंगारवट, अति दीनता से निवेदन भी करता जा रहा था और खींचे भी जा रहा था।कितना अपराध बना? मैं नहीं जानता।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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