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*श्रीनिताई चाँद*

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*श्रीकमलाकर पिपलाई*

*कमलाकर पियलाई नाम्नासीद्यो महाबलः ।।*
गो० गु० ५२८

   श्रीकमलकर पिघलाई द्वादश गोपाल में श्रीमहाबल गोपाल थे।ब्रजलीला में जो महाबल गोपाल थे, वही नवद्वीप लीला में आकर कमलाकर पिपलाई हुए।

   श्री्मन्नित्यानन्द की शाखा के हैं एवं पार्षद भी। हुगली जिला के श्रीरामपुर निकट महेश ग्राम में इनका ब्राह्मण कुल में जन्म हुआ। श्रीकृष्ण में अलौकिक प्रेम था इनका दिन रात निरन्तर श्रीराधा-कृष्ण लीला-गुण गान करते रहते थे ।समस्त वैष्णवों को प्राण समान प्रिय थे।श्रीविष्ण-वैष्णवों का पूजा अर्चना करना इनका नित्य कृत्य था। माहेश ग्राम में इन्होंने श्रीजगन्नाथ विग्रह की प्रतिष्ठा की।

    कृष्ण प्रेम के आविर्भूत होने पर सब प्रेमियों का चित्त द्रवीभूत हो उठता है। अनेक प्रेमियों को अश्रु-पुलक कम्यादि सात्विक विकार बाहर प्रकाशित होते हैं, किन्तु कुछ एक ऐसे भी गम्भीर प्रेमी-भक्त होते हैं उनके नेत्रों से अश्रु बाहर नहीं निकलते । श्रीकमलाकर भी इसी गम्भीर प्रकृति के भक्त थे। चित्त के द्रवीभूत होने घर भी इनके नेत्रों से अश्रु नहीं निकलते थे। यह दीनतावश अपने को अति कठोर चित्त मानते थे। और अपने को हतभागा कहते थे। जैसे कि श्रीमदभागवत (२-३-२४) में कहा गया है-
*तदश्मसारै हदयै बतेदं यद् गृह्यमाणैर्हरिनामधेयैः ।।*
*न विक्रियेताथ यदा विकारो नेत्रे जलं गात्ररुहेषु हर्षः ।।*

   श्रीशौनक ऋषि ने सूतजी से कहा-हे सूत ! श्रीहरिनाम श्रवण-कीर्तन करने से नेत्रों से आँसू छलक पड़ते हैं और शरीर पुलकित हो उठता है, किन्तु श्रीहरिनाम श्रवण कीर्तन करने पर भी जिनका हृदय नहीं पिघलता वह हृदय वज्र के समान कठोर है।
परन्तु इनका हृदय तो द्रवीभूत हो उठता है (जो प्रेम का मुख्य लक्षण हैं)किन्तु नेत्रों से आँसू नहीं छलकते थे। इन्होंने अपने नेत्रों को पाषाणवत् समझकर और उन्हें दण्ड देने के लिए एक दिन पीपल का चूर्ण अपनी आँखों में लगा लिया, ताकि उनमें से आँसू बह निकले। ऐसा ही हुआ, पीपल चूर्ण आँखों में लगाने से इनके नेत्रों से आँसू बह निकले। श्रीमहाप्रभु ने इनकी यह चेष्टा देवकर ही उनका नाम पिपलाई रख दिया। तभी से यह कमलाकर पिपलाई नाम से विख्यात हुए।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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