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*श्रीनिताई चाँद*
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*पण्डित श्रीगौरीदास*
यह द्वादश गोपालों में आप एक हैं। पूर्वलीला में सुबल सखा थे।
*सुबलो यः प्रियश्रेष्ठः स गौरीदास पण्डितः ।।*
श्रीकृष्ण के परम प्रिय मित्र श्रीसुबल ही नवद्वीप लीला में श्रीगौरीदास पण्डित नाम से विख्यात हुए।
श्रीसूर्यदास सरखेल के ये भाई थे और अम्बिका नगर में बास करते थे।इनके पिता का नाम कंसारि मिश्र था और माता का नाम था कमलदेवी।इनकी पत्नी का नाम विमलादेवी था।श्रीमन्महाप्रभु एवं निताईचाँद की इन पर विशेष कृपा थी। एक बार श्रीमन्महाप्रभु एवं श्रीनित्यानन्द प्रभु हरिनदि ग्राम से स्वयं ही चप्पू से नौका को चलाते-चलाते इनके घर पधारे। इनके घर के बाहर एक इमली का वृक्ष था, उसके नीचे जाकर विराजमान हो गए। अनेक दिन पीछे प्रभुद्वय के अचानक दर्शन पाकर श्रीगौरीदास फूले न समाये। प्रभु के चरणों में प्रार्थना की हे प्रभो ! आप कृपा पूर्वक मेरे यहाँ कुछ दिन निवास करो। अब मैं आपको जाने नहीं दूंगा प्रभु ने इनकी प्रार्थना स्वीकार की।
श्रीमहाप्रभु जिस चप्पू से नौका चला कर आये थे उसे श्रीगौरीदास को देकर बोले-गौरीदास ! यह लो चप्पू । अब तुम इसके द्वारा असंख्य जीवों को भव नदी से पार ले जाना। इसी प्रकार श्रीमन्महाप्रभु ने इन्हें अपनी हस्तलिखित गीता भी प्रदान की जिसका यह नियम सहित पाठ करते थे। अभी तक अम्बिका ग्राम में श्रीमहाप्रभु प्रदत्त चप्पू और गीता जी विद्यमान है।
प्रभु ने इनके द्वारा नदिया से एक नीम वृक्ष मंगाया था। प्रभु ने उस वृक्ष की लकड़ी से अपनी और श्रीनित्यानन्द प्रभु की एक-एक प्रतिमूर्ति तैयार कराई एवं श्रीगौरीदास को प्रदान की। यह उन श्रीविग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा कर अचला भक्ति से सेवा पूजा करने लगे। एक दिन इनके प्रेम के वशीभूत होकर इन श्रीविग्रहों ने गौरीदास द्वारा अर्पित भोग-व्यञ्जनों का साक्षात् भोजन किया। यह सदा उनकी सेवा में निमग्न रहने लगे।
एक दिन श्रीनिताई–गौर प्रभु मन्द मुसकराते हुए बोले-“गौरीदास !तुम्हारे प्रेम को कौन जान सकता है ? तुम ही अपने स्वरूप को भूल गए हो।तुम तो हमारे सुबल सखा हो। तुम्हें वह सब कौतुक जो यमुना पुलिन में गौएँ राते समय किये थे, भूल गए हैं। इतना कहते ही दोनों श्रीकृष्ण एवं बलराम चराते समय किये थे, भूल गए हैं। इतना कहते ही दोनों श्रीकृष्ण एवं बलराम स्वरूप में प्रकट हो गए। वही व्रज का गोपवेश, वंशी, श्रृंग, वेत्र, मोर मुकुट आदि देखकर ये आत्म-विभोर हो उठे। कुछ देर के बाद जब चेतना आई तो सिंहासन पर फिर श्रीनिताई–गौर को बैठे देखा।
एक दिन इनके मन में अभिलाषा जाग उठी कि प्रभद्वय को मैं किसी प्रकार सोने चाँदी के अनेक आभूषणों से अलंकृत करूं । परन्तु हाय ! मेरे पास यह कहाँ से आवें ? दूसरे दिन ज्यूं ही प्रातःकाल श्रीगौरीदास मन्दिर में घुसे तो देखते हैं कि दोनों प्रभुपाद अनेक रत्न जटित सोने के अलंकारों से विभूषत हो रहे हैं। अद्भुत रूप, वेशभूषा को देखकर ये विस्मित हो उठे। प्रभु ने
मुसकराते हुए कहा-गौरीदास ! मेरे पास स्वर्ण के अलंकारों की कमी नहीं है,
परन्तु मुझे तो पुष्प–पत्तों एवं मोर पुच्छ के अलंकार ही अधिक प्रिय हैं। मुझे वन्य-भेष ही अधिक सुहाता है। प्रभु ने अपने उस अलंकार विभूषित रूप को छिपा लिया। तब गौरीदास ने पत्र-पुष्पों के अनेक अलंकार तैयार कर प्रभु को पहिराये इस प्रकार श्रीगौरीदास के अनेक रसमय चरित्र हैं। श्रीभगवान् इनके वशीभूत ही रहते थे। आज तक वे श्रीश्रीनिताईगौर के श्रीविग्रह भी अम्बिका ग्राम में विद्यमान हैं।
क्रमशः
श्रीगुरुगौरांगो जयते !!
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