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*श्रीनिताई चाँद*

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*श्रीपुरन्दर पण्डित*

    ये खड़देह के निवासी थे। जिस समय श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु खड़देह आए उससे भी पहले ये यहाँ निवास करते थे। इनका देवालयादि सब यहाँ थे।जैसे समुद्र लीला में मंदराचल घूमा था, उसी प्रकार ये प्रेम समुद्र में घूमते थे।श्रीनिताई चाँद इनके ही देवालय में जाकर नृत्य कीर्तन करते थे। श्रीचैतन्यदास,मुरारी आदि सब भक्तगण इनके यहाँ ही एकत्र होकर कृष्ण संकीर्तन में उन्मत्त हो उठा करते थे।

    एक बार श्रीपुरन्दर पण्डित ऐसे आविष्ट हो उठे कि मैं अंगद हूँ, मैं अंगद हूँ-कहकर इतने जोर से कूदे कि वृक्ष पर चढ़ गए और वहाँ से फिर कूद पड़े।

    जगन्नाथपुरी में ये सदा श्रीमन्महाप्रभु के पास ही सेवा में रहते । जब श्रीमन्महाप्रभु आज्ञा से श्रीनिताईचाँद गौड़ देश में प्रेम वितरण के लिए पधारे तो श्रीमन्महाप्रभु ने इन्हें भी उनके साथ भेजा—इतने आत्मीय थे ये श्रीमन्नित्यानन्द
प्रभु के ।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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