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*श्रीनिताई चाँद*
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*श्रीपरमेश्वरदास*
द्वादश गोपालों में ये एक हैं। विप्रकुल में इनका जन्म हुआ और केतुग्राम से खड़देह में आकर बसने लगे थे। पूर्व लीला में ये श्रीअर्जुन थे।
*नाम्नार्जुनः सखा प्राग यो दासः श्रीपरमेश्वरः ।।*
(गौ० ग० १३२)
व्रजलीला में श्रीकृष्ण का जो अर्जुन नाम का सखा था, वही नवद्वीप लीला में श्रीपरमेश्वरदास हुए।
श्रीनिताईंचाँद के अनन्य शरणागत ये। श्रीकविराज गोस्वामिपाद ने लिखा है-
*कृष्ण भक्ति पाय ताँरे ये करे स्मरण।।*
(चै० च० १-११-२६)
इनका जो स्मरण करता है, उसे श्रीकृष्ण भक्ति प्राप्त होती है।ईश्वरी माता श्रीजाहनवा जी की श्रीवृन्दावन यात्रा में ये साथ थे। लौटते समय श्रीईश्वरी की आज्ञा से ये गरलगाछा ग्राम में रहे और तड़ा आटपुर में
इन्होंने श्रीराधाकृष्ण गोपीनाथ विग्रह की प्रतिष्ठा की। इनमें अलौकिक शक्ति थी।
एक बार आकनामहेश गांव में श्रीकमलाकर पिपलाई के घर में नाम संकीर्तन हो रहा था और ये कृष्णप्रेम में उन्मत्त होकर नृत्य कर रहे थे। उस समय कुछ एक पाखण्डी लोगों ने एक मरा हुआ गीदड़ संकीर्तन-कारियों के बीच में उछाल मारा सब चौंक उठे। श्रीपरमेश्वरदास अक्रोध परमानन्द श्रीनिताई के ही तो अनन्य भक्त थे, इन्हें जरा भी क्रोध नहीं आया। इन्होंने उस मरे हुए गीदड़ की ओर देखकर ज्यों ही कृष्ण-कृष्ण कहा, वह गीदड़ जीवित होकर नाम का उच्चारण करते हुए कूद कर बाहर भाग गया। सब वैष्णवों व ग्राम वासियों के आश्चर्य की सीमा न रही। वे पाखण्डी भी इनके प्रभाव को देखकर इनकी शरण में आए और क्षमा याचना की। इन्होंने उन्हें भी कृष्ण प्रेम दान कर कृतार्थ कर दिया।
जब ये तड़ा आटपुर में निवास कर रहे थे, एक दिन इन्होंने दो दाँतुन पृथ्वी में गाड़ दिये। सबके देखते-देखते ही वे बढ़कर दो प्रकाण्ड बकुल के वृक्ष बन गए, जो आज तक वहाँ विद्यमान हैं, ऐसे अनेक अद्भुत चरित्र हैं इनके।
क्रमशः
श्रीगुरुगौरांगो जयते !!
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