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*श्रीनिताई चाँद*

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*श्रीमीनकेतन रामदास*

   श्रीमन्नित्यानन्द के अनन्य भक्त थे ये। महाप्रेममय थे और हर समय-कम्पादि भाव-भूषणों से विभूषित रहते थे। ये संकर्षण के दूसरे व्यूह थे।

*मीनकेतनरामादिव्यूहः संकर्षणोऽपरः ।।*
(गौ० ग०६८)

     एक बार श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत के रचयिता श्रीकृष्णदास कविराज के निवास स्थान पर अष्ट प्रहर का श्रीनाम संकीर्तन उत्सव हुआ। उसमें इन्हें भी निमन्त्रित किया गया। जिस समय ये वहाँ पधारे तो उपस्थित समस्त वैष्णवों ने इनकी वन्दना की, अभिवादन किया। ये प्रेम में इतने विभोर थे कि किसी की पीठ पर चढ़ते तो किसी को वंशी मारते तो किसी को चपेट ही लेते।इनके नेत्रों से निकलने वाली अश्रुधारा को देखने वालों की आँखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी। पुलक, कम्पादि सात्विक-विकार अद्भुत थे, हा नित्यानन्द !हा नित्यानन्द !कहकर अति हुँकार कर रहे थे। यह सब देख-सुनकर सब चमत्कृत हो उठे।

    श्रीकविराज के मन्दिर का पुजारी गुणार्णव मिश्र ठाकुर सेवा में व्यस्त था,उसने इन्हें प्रणाम नहीं किया।श्रीरामदास तो श्रीबलराम पार्षद-आवेश में थे,उन्हें ऐसा लग रहा था कि श्रीबलराम जी मेरे साथ पधारे हैं।गुणार्णव को प्रणाम-वन्दना न करते देख, श्रीबलराम जी अति अपमान मानकर यह क्रोधित हो उठे और बोले-अरे ! यह तो दूसरा रोमहर्षण सूत है, जिसने श्रीबलराम जी के सभा में पधारने पर वन्दना-प्रणाम नहीं किया था। जब ध्यान से देखा कि
यह तो कृष्ण-सेवा में लगा हुआ है तो शान्त हो गए।

     श्रीरामदास मीनकेतन का इस प्रकार भावावेश देखकर श्रीकविराज का छोटा भाई श्रीश्यामदास कुछ अन्यमनस्क हो उठा। वह था श्रीचैतन्यदेव का अनन्य भक्त। उसका श्रीचैतन्यदेव में पूर्ण विश्वास था, परन्तु श्रीनित्यानन्द प्रभू में भगवद्-बुद्धि नहीं थी। इनके साथ उसका इस विषय को लेकर कुछ बाद-विवाद हो उठा, जिससे श्रीरामदास जी अति दुःखी हए। अपनी वंशी तोडकर वहाँ फैंक दी और वहाँ से चले गए।श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु तथा श्रीमन्नित्यानन्द प्रभुपाद में इस प्रकार की भेद दृष्टि के कारण श्रीकविराज ने भाई को फटकारा । फल-स्वरूप श्यामदास का सर्वनाश हो गया।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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