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*श्रीनिताई चाँद*
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*माधव एवंवासुदेव घोष*
इन दोनों की गणना श्रीमन्महाप्रभु की तथा श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु दोनों की शाखाओं में की जाती है। श्रीमाधव घोष मुख्य कीर्तनिया थे और इनके ही गान में श्रीनिताईचाँद नृत्य करते थे। श्रीवासुदेव का गान इतना मर्मभेदी एवं रसमय होता था कि जिसे सुनकर काष्ठ और पाषाण भी पिघल जाते थे।
*श्रीरघुनाथ वैध*
इनके दर्शन मात्र से ही कृष्ण-प्रेम भक्ति उदित हो उठती थी। खेतुरी के विख्यात उत्सव में ये उपस्थित थे। श्रीमहाप्रभु के आदेश से श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु के साथ गौड़ देश में प्रेम-प्रचार के लिए पधारे थे। पथ में इनमें रेवती-का भाव उदय हो उठा था। अनेक जनों को इन्होंने प्रेम दान किया।
*पुरा सुदाम नानासीदद्य ठक्कुर सुन्दरः ।।।*
(गौ० ग० १२६)
*श्रीसुन्दरानन्द ठाकुर*
पूर्वलीला में ये सुदामा सखा थे। नवद्वीप लीला में श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु के पार्षद एवं उनकी शाखा के हैं। श्रीनिताईचाँद के आन्तरिक सेवक थे। प्रभुपाद इनसे ब्रज की रहस्य पूर्ण लीलाओं का भी कथोपकथन करते थे।इतने प्रभावशाली थे ये कि एक दिन प्रेमोन्मत्त होकर नदी में से मगरमच्छ को ही पकड़ कर बाहर निकाल लाए। ये महेशपुर हलदा नगर में निवास करते थे।
*वसुदाम सखा यश्च पण्डितः श्रीधनञ्जय ।।*
(गौ० ग० १२७)
*श्रीपण्डित धनञ्जय*
ये ब्रजलीला में वसुदाम सखा थे। द्वादश गोपालों में एक हैं इनके पिता का नाम श्रीपति वन्द्योपाध्याय एवं माता का नाम श्रीमती कालिन्दीदेवी था। ये जाड़ ग्राम निवासी थे। इन्होंने श्रीगौर निताई-श्रीगोपीनाथ एवं श्रीदामोदर के श्रीविग्रहों की स्थापना की। बाल्यकाल से ये श्रीतुलसी को तीनों काल श्रद्धा सहित नियम पूर्वक साष्टांग प्रणाम करते थे। विवाह के अल्पकाल बाद ही संसार को छोडकर तीर्थ पर्यटन के बहाने निकल पड़े। पिता धनाढ्य थे।उन्होंने रास्ता खर्च के लिए बहत धन दिया, परन्तु श्रीमहाप्रभु के दर्शन करते ही सब उनके चरणों में समर्पण कर दिया और केवल कमण्डलु हाथ में लेकर चल दिये।
इन्होंने शीतल ग्राम के अनेक डाकू-पाखण्डियों का उद्धार किया और उन्हें भक्त बना दिया। श्रीमहाप्रभु के दर्शन के बाद वृन्दावन ही चले आये।श्रीवृन्दावन की यात्रा के बाद पुनः शीतल ग्राम में ही जाकर निवास करने लगे।
क्रमशः
श्रीगुरुगौरांगो जयते !!
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