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*श्रीनिताई चाँद*
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*श्रीकृष्णदास बिहारी*
ये विहार देश निवासी थे।श्रीमननित्यानन्द प्रभु इन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय थे। किसी भी अन्य भगवत स्वरूप में इनकी निष्ठा न थी। सबको अपने इष्ट श्रीनित्यानन्द रूप में ही नमस्कार करते थे। प्रभु श्रीनिताई चाँद के बिना और कुछ न जानते थे।
*श्रीकृष्णानन्द*
विप्रकर रत्नगर्भाचार्य के ये सबसे बड़े पुत्र थे। श्रीकृष्ण चरण कमल के मतवारे मधुकर थे । पूर्वलीला में कलावती थे।
*रत्नरेखा कृष्णदासः कृष्णानन्दः कलावती ।।*
श्रीनित्यानन्द प्रभु के पार्षद थे ।जीव एवं यदुनाथ इनके दो भाई और थे। ये दोनों ही कृष्ण भक्तेि रँग में रंगे हुए थे।
*श्रीकंसारि सेन*
ये प्रसिद्ध वैद्य थे सदा शिव कविराज इनके ही पुत्र थे। ब्रजलीला में ये रत्नावली थे।
*रत्नावली च कमला-गुणचूड़ा सुकेशिनी ।।*
*कसारिसेनः सेनः जगन्नाथो महाशयः ।।*
रत्नावली, कमला,गुणचूड़ा एवं सुकेशिनी ये श्रीराधा जी की सेविकाएँ क्रमशः कंसारि सेन, श्रीजगन्नाथ सेन ,सुबुद्धि तथा श्रीहर्ष नाम से नवद्वीप लीला में प्रकट हुए।श्रीनिताईचाँद के चरणों में इनका अटूट प्रेम था।
*श्रीमाधवाचार्य*
ये श्रीमन्नित्यानन्द प्रभुपाद की सुपुत्री श्रीमती गंगादेवी के पति थे। इनके पिता का नाम देिवेश्वर चट्टोपाध्याय और माता का नाम महालक्ष्मीदेवी था।प्रसव के तुरन्त बाद माता के स्वधाम चले जाने के कारण इनका पालन-पोषण श्रीगोपाल आचार्य एवं उनकी पत्नी ने किया था। समय आने पर इन्होंने नाना शास्त्र अध्ययन किया और आचार्य उपाधि से प्रसिद्ध हो गए।इनमें कृष्ण-भक्ति के जन्मजात संस्कार थे और श्रीनिताईचाँद के चरणों में अडिग प्रीति थी।
*ज्ञानदास*
माता जानहबादेवी के शिष्य थे ये। कोदड़ा ग्राम में ब्राह्मणकुल में इनका जन्म हुआ। यौवन अवस्था में ही संसार की असारता का अनुभव कर वैरागी बन गए। इन्होंने बांगला और ब्रजभाषा की सरस पदावली रचना की। पूर्वराग,सखी शिक्षा, मुरली शिक्षा,गोष्ठ विहार, मान, माथुर, प्रश्नदुतिका नौकाखण्ड, इत्यादि इनकी पदावली साहित्य में अलंकार की तरह सुशोभित हैं। कहीं कहीं इनकी 'ज्ञानवल्लभदास' की छाप भी देखने में आती है।
*श्रीनृसिह चैतन्य*
ये श्रीमन्नित्यानन्द प्रभुपाद के अनन्य प्रेमी थे। खेतुरी के महान उत्सव में ईश्वरी श्रीजानहवा माँ के साथ ये सम्मिलित हुए थे और समस्त वैष्णवों को माला-चन्दन प्रदान करने का भार इन पर था, माता जानहवा की अपार कृपा थी इन पर ।
*श्रीआत्मारामदास*
श्रीनिताईचाँद के परम भक्त थे। श्रीमहाप्रभु के समसामयिक थे। जाति के वैद्य थे, श्रीखण्ड के निवासी थे। ‘प्रेमविलास' ग्रन्थ के रचयिता श्रीबलरामदास के पिता थे। ये एक प्रसिद्ध पदकर्ता एवं कीर्तनिया थे।उपर्युक्त निताईचाँद के अन्यतम पार्षद, अनन्यनिष्ठ भक्तों के अतिरिक्त उनके समसामयिक और भी असंख्य भक्त हुए जो कृष्ण–प्रेम के सागर थे।श्रीगौरांग-निताईचाँद के अपार करुणापात्र थे, उनमें भी कुछ एक महानुभावों के केवल नाम उल्लेख कर आत्म शोधन का सौभाग्य प्राप्त करता हूँ-
*सर्व श्रीनकड़ि मुकुन्ददास, सूर्यदास, माधवदास, श्रीधर, रामानन्द वसु,जगन्नाथ, महीधर, श्रीमन्त, गोकुलदास, हरिहरानन्द, शिवाई, नन्दाई, अवधूत परमानन्द, वसन्त, नवमि-होड़, गोपाल, रामानन्द, सनातन, विष्णाई हाजरा,रामसेन, कविराज, रामचन्द, गोविन्द, श्रीरंग एवं मुकुन्द पीताम्बर,दामोदरदास,शंकर, मुकुन्ददास, मनोहर, नर्तक गोपाल, रामभद्र गौरांगदास । श्रीआचार्य चन्द्र कमलाकान्त पण्डित, कुमुद कविराज कृष्णदास, तथा कृष्णदास होड़।*
इस प्रकार अनन्तानन्त, असंख्य भक्त हुए हैं श्रीनिताईचाँद के। अनन्तदेव
भी गणना कर उनका अन्त नहीं पा सकते । परम करुणामय श्रीनिताईचाँद के चरणों में भक्ति करने वाले महानुभावों के एक-एक के फिर असंख्य शिष्य हुए जो श्रीनिताई चाँद की लीलाओं का स्मरण चिंतन कर उनकी कृपा के भागी हुए।
क्रमशः
श्रीगुरुगौरांगो जयते !!
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