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*श्रीनिताई चाँद*

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श्रीनिताईचाँद के समकालीन
तथा कुछ समय बाद के कुछ एक पार्षद वृन्द का संक्षिप्त परिचय उल्लेख करने के बाद अब यहाँ उनके कुछ एक भक्त पार्षदों का चरित्र वर्णन करते हैं जो गत सौ पचास वर्ष के भीतर ही इस पृथ्वीतल पर विराजमान थे और उन्होंने श्रीनिताईचाँद की कृपा शक्ति से असंख्य जीवों का उद्धार कर उन्हें प्रेम-भक्ति के पावन-पथ का पथिक बना दिया।

*श्रीराधारमणचरणदासजी*
       (बड़ेबाबा)

जशोहर जिलान्तर्गत महिषखोला नामक ग्राम में कायस्थ जाति श्रीमोहनचन्द्र
घोष की द्वितीय पत्नी कनक सुन्दरी से आपने २६ चैत्र बंगाब्द १२६० में जन्म ग्रहण किया। जन्म के बाद आपने माता का स्तन पान नहीं किया। श्रीरजनीकान्त भट्टाचार्य के द्वारा इसका निदान करने पर जब इनके मुख में श्रीभगवान् का प्रसाद दिया गया, उसके बाद आपने माता का स्तन पान किया। इनका नाम राईचरण रखा गया। जब ये पाँच वर्ष के थे, इनके पिता का देहावसान हो
गया।

    समय पर आपने विद्याध्यन आरम्भ किया छात्र जीवन आपका विलक्षण था। परोपकार करने में सदा सचेष्ट थे। समय पर इन्होंने गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया, किन्तु इनकी आसक्ति कहीं भी न थी।

     इन्होंने श्रीयोगेन्द्रनाथ भट्टाचार्य से दीक्षा ग्रहण की और भजन में प्रवृत्त होते ही थोड़े दिन बाद नौकरी, फिर घर-बार का भी त्याग कर दिया और फिर अयोध्या में आकर श्रीयोगेन्द्रनाथ गोस्वामी से इन्होंने वैष्णव-दीक्षा प्राप्त की। श्रीगुरुदेव ने परनिन्दा शून्य होकर श्रीनिताईचाँद का चरणाश्रय ग्रहण करने का उपदेश किया। सदा हरिनाम संकीर्तन करते हुए मनः शिक्षा,
श्रीचैतन्य चरितामृत, प्रार्थना आदि ग्रन्थों का पाठ एवं मनन करने की आज्ञा दी। श्रीगुरुदेव की आज्ञा पाकर तीर्थाटन के लिए निकल पड़े। नवद्वीप में आकर तो ये श्रीगौरांग प्रेमानन्द में विभोर हो उठे। वहाँ इन्हें श्रीमन्महाप्रभु एवं श्रीनिताई चाँद के स्वप्न में दर्शन हुए।श्रीजगन्नाथ पुरी में गम्भीरा आदि स्थानों के दर्शन कर गदगद कंठ हो अजस्त्र अश्रुधारा प्रवाहित करते हुए कहने लगते ---

*कोथा हे गौरांग चाँद देखा दाओ मोरे।।*
*गौड़ हइते आसियाछि देखिते तोमारे ।।*

   अनेक दिन वहाँ रहकर गौर लीला स्थलियों के दर्शन कर प्रेम विभोर हो गए। अनेक लोगों के सन्देह-शंकाओं का निरसन कर इन्होंने उन्हें श्रीगौर-निताई की चरण-भक्ति प्रदान की। उड़िया वासियों पर इनकी विशेष कृपा थी। बंगाल में तो बड़े बाबाजी महाशय' नाम से प्रसिद्ध हो गए।

   एक दिन आप जब श्रीमहाप्रभु बाड़ी से कीर्तन करते हुए शिष्यों के साथ लौट रहे थे तो एक कुतिया इनके साथ हो ली। जहाँ-जहाँ रुककर कीर्तन करते, आगे बढ़ने पर वह कुतिया वहाँ की रज में लोट-पोट होकर फिर इन पीछे चल पड़ती। भागवत् प्रसादी के बिना वह कुछ भी ग्रहण न करती थी,शिष्यगण उसे भी एक प्रसादी पत्तल नित्य दिया करते ।।

   दैववश वह अस्वस्थ होकर मर गई उसका गंगा में प्रवाह कर दिया गया,आपके मन में विचार आया कि इस वैष्णव जीव का भी महोत्सव किया जाना चाहिए, तैयारी होने लगी। बड़े अखाड़े के समस्त वैष्णवों को निमन्त्रण भेजा गया। साथ ही इन्होंने अपने शिष्यों द्वारा मुहल्ले-मुहल्ले में जाकर कुत्ते-कुतियों को भी सादर निमन्त्रण दे आने का आदेश दिया। वैष्णवों के साथ, कुत्तों को भी प्रणाम पूर्वक प्रसाद ग्रहण करने का निमन्त्रण दे दिया गया।

    कुत्तों का महोत्सव जानकर कोई भी वैष्णव वहाँ भोजन करने को तैयार न हुआ। इधर सब भोग सामग्री तैयार थी। भोग लग गया, कोई भी वैष्णव न आया, श्रीराधाचरणदास जी स्वयं अखाड़े में गए अनेक अनुनय-विनय कर पर भी वे प्रसाद ग्रहण करने को तैयार न हुए काफी देर हो गई। शिष्य समाज भी अनेक वाद-विवाद करने लगे। होता क्या है कि इतने में एक-एक कर अनेक कुत्ते वहाँ आने लगे। बड़े बाबा जी ने सबको साष्टांग प्रणाम किया और वे सब पंक्ति लगा कर बैठ गए। चारों ओर बात फैली और असंख्य दर्शक भी वहाँ आकर कौतुक देखने लगे।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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