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*श्रीनिताई चाँद*

    9⃣6⃣

*श्रीराधारमणचरणदास जी*
     (बड़े बाबाजी)

    कुत्तों का महोत्सव जानकर कोई भी वैष्णव वहाँ भोजन करने को तैयार न हुआ। इधर सब भोग सामग्री तैयार थी। भोग लग गया, कोई भी वैष्णव न आया, श्रीराधाचरणदास जी स्वयं अखाड़े में गए अनेक अनुनय-विनय करने पर भी वे प्रसाद ग्रहण करने को तैयार न हुए काफी देर हो गई। शिष्य समाज भी अनेक वाद-विवाद करने लगे। होता क्या है कि इतने में एक-एक कर अनेक कुत्ते वहाँ आने लगे। बड़े बाबा जी ने सबको साष्टांग प्रणाम किया और वे सब पंक्ति लगा कर बैठ गए। चारों ओर बात फैली और असंख्य दर्शक भी वहाँ आकर कौतुक देखने लगे। बड़े बाबा ने आज्ञा माँग कर उपस्थित पचास-साठ कुत्तों के आगे पत्तल डलवाये और क्रमशः पूरी, साग, खीर आदि परोसी जाने लगी। आश्चर्य यह कि किसी भी कुत्ते ने झपटा-झपटी नहीं की, आवाज नहीं की, आराम से बैठे रहे। परोसगीरी हो जाने पर जब बड़े बाबा ने कहा 'अब कृपा कर प्रसाद पाना आरम्भ कीजिए' तो सब भोजन करने लगे। कुल्हडों में जल पान करने लगे। चारों ओर 'जय निताईचाँद की' 'बड़े बाबा की जय' ध्वनि होने लगी। सब दर्शकों ने श्रीनिताईचाँद की अपार कृपा शक्ति का अनुभव किया और बड़े बाबा के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा उत्पन्न हो।

     श्रीनवद्वीपदास, श्रीनिताईचाँद के अति अनुरागी भक्त थे और समस्त
घर-बार को छोड़कर सदा इनके साथ रहा करते थे। एक बार वह खाँसी-ज्वर से पीडित हो गए और उनका देहवसान हो गया।ज्योतिषियों ने यह उन्हें पहले ही बता रखा था और बड़े बाबा भी उनकी आयु समाप्ति की बात पहले
जान चुके थे। संग के शिष्य समाज उनके निधन से बहुत दुःखी होकर रोने लगे। आपने सबको श्रीनिताईचाँद के नाम का कीर्तन करने का आदेश किया। आपने उसके मृतक शरीर को खड़ा करवा कर कीर्तन करते हुए आलिंगन किया। सबके विस्मय और आनन्द की सीमा न रही कि श्रीनवद्वीपदास भी खड़े-खड़े 'जय श्रीनिताई गौर' कहते-कहते नाचने लगे। उनका पुनर्जीवन देखकर इनकी अपार शक्ति का सबने प्रत्यक्ष दर्शन किया।

   इसी प्रकार एक वृद्ध वैष्णव श्रीगदाधरदास को भी पुनः जीवन दान किया। उसे सन्ध्या के समय एक विषैले सांप ने काट खाया। अनेक उपचार करने पर भी उसका शरीर पात् हो गया। किन्तु उनकी यह दशा देखकर आपने गदाधरदास के शरीर को बीच में रखा और चारों ओर घूम-घूम कर अनेक वैष्णवों के साथ 'जय निताई' 'जय निताई' उच्चस्वर से संकीर्तन करने लगे। अत्यन्त प्रेम-विभोर होकर आपने एक बार गदाधर के मस्तक पर अपना चरण स्पर्श किया। ऐसा होते ही गदाधर वैष्णव रोते-रोते 'जय निताई 'जय
निताई' कीर्तन करता हुआ उठ खड़ा हुआ। ढाई साल जीवित रहा वह श्रीगदाधर तदुपरान्त उसने श्रीराधाकुण्ड में आकर नित्य लीला में प्रवेश किया।

    इस प्रकार श्रीराधारमण चरणदास जी बड़े बाबा महाराज के अनेक अलौकिक चरित्र हैं। इन्होंने कई वैष्णवों को पुनर्जीवन दान दिया, अनेकों को श्रीगौर-निताई चरणारविन्द का प्रेम प्रदान किया तथा अनेकानेक बहिर्मुख त्रिताप-तप्त जीवों के कुतर्कों का निरसन कर उन्हें श्रीनिताईचाँद के शरणापन्न कर उनका परम कल्याण विधान किया।

*भज निताई गौर राधे श्याम। जप हरे कृष्ण हरे राम।।*

यह मन्त्र बड़े बाबा की देन है, जो उनके अनुगत वैष्णवों को प्राण तुल्य प्रिय है और इसके जप-कीर्तन से अनेकों साधकों ने श्रीनिताई चाँद की कृपा प्राप्त की है।

क्रमशः

श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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