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*श्रीनिताई चाँद*
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*पण्डित श्रीरामकृष्णदास बाबाजी महाराज*
सम्वत १६१४ विक्रम के भाद्रपद मास में जयपुर जिलान्तर्गत भुराटिया नामक गावँ के एक कुलीन गौड़-ब्राह्मण वंश में आपका जन्म हुआ था।जन्म-नाम था श्रीरामप्रताप मिश्र। आपके पिता श्रीरामानन्दी वैष्णव थे, पर माता जी बल्लभकुल की कन्या थीं। आपके पिताजी का देहान्त सम्वत् १६२२
में हो गया। इनके पितामह रामानुजी वैष्णव थे, जिन्हें घोड़े पर विराजमान श्रीरामचन्द्र जी के साक्षात् दर्शन हुए थे। इनका वंश जयपुर राजा का अध्यापक-वंश था। श्रीरामप्रताप बचपन से ही भक्ति में अनुरक्त देखे जाते थे।जब ये सात या आठ वर्ष के थे, तभी माधवपुर के झरने से, जो इनके गाँव से
बहुत दूर था, श्रीकृष्ण-पूजा के लिए अकेले जाकर जल लाया करते थे।
आपने नौ वर्ष की अवस्था में ही पाणिनी व्याकरण का अध्ययन शेष कर लिया। इसी समय जयपुर में श्रीनित्यानन्ददास बाबा के शिष्य कर्णाटी ब्राह्मण श्रीनृसिंहानन्द भट्ट के साथ इनका वार्तालाप हुआ। श्रीनृसिंहदास जी षड्दर्शन-पण्डित थे और संगीत तथा संकीर्तन में अति कुशल तभी से आपकी गौड़ीय-वैष्णवों में अत्यन्त श्रद्धा हो गई।
एकादशवें वर्ष में आपका उपनयन संस्कार हुआ। पुरश्चरण करने पर दर्शन देकर सावित्री ने इन्हें श्रीवृन्दावन जाने का आदेश किया। दो-तीन वर्षों के पश्चात् ही आप वृन्दावन आ गए।
वृन्दावन आकर आपने विभिन्न सम्प्रदाय के सिद्धान्तों तथा भक्तिग्रन्थों का गहन अध्ययन किया । बंगला, उर्दू आदि तो आप पहले ही पढ़ चुके थे। .
अध्ययन के पश्चात् आपने मदन ठौर के सिद्ध श्रीनित्यानन्ददास बाबाजी
महाराज से दीक्षा व भेष-ग्रहण किया। तत्पश्चात् उन्हीं की आज्ञा से बरसाने जाकर भजन में प्रवत्त हो गए। वहाँ प्रसिद्ध कीर्त्तनिया श्रीगौरचरणदास बाबाजी से कीर्तन सीखने लग गये। अब भजन का आवेश कम होकर उसी का आवेश बढ़ने लगा। सिद्ध बाबाजी महाराज ने यह जान कर इन्हें फिर वृन्दावन बुला लिया एवं भजन में लगाने की चेष्टा की। सिद्ध बाबाजी की आज्ञा पाकर आप पुनः बरसाने गये, परन्तु फिर भजन में मन नहीं लग रहा था।तब आपने अष्टादशाक्षर श्रीगोपाल-मन्त्र का ७० दिन पर्यन्त पुरश्चरण किया।उसके फल स्वरूप उद्धव-क्यारी में कदम्ब की छाया तले आपको श्रीप्रिया-प्रियतम के दर्शन मिले।
जब श्रीयुगल सरकार ने वर माँगने को कहा तो बोले-'मैं तो श्रीगुरुदेव की आज्ञा से भजन करता हूँ, मुझे क्या चाहिए यह मैं नहीं जानता।' तब इन्हें आज्ञा मिली कि "राघव-गुफा में जाकर भजन करो।" उसी समय हिंसक जन्तुओं से घिरी हुई उस गुफा में जाकर देह-अनुसन्धान रहित होकर आपने छ: वर्ष तक अनवरत रात-दिन भजन किया।
क्रमशः
श्रीगुरुगौरांगो जयते !!
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