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*श्रीनिताई चाँद*
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माता इनकी खोज करते-करते श्रीवृन्दावन आई और श्रीराघव-गुफा के दरवाजे पर तीन-दिन तक बैठी पुकारती रहीं, किन्तु कुछ भी उत्तर न मिलने पर, मिल सकने में असमर्थ रोती-रोती वापिस जयपुर लौट गईं। उनकी करुण-पुकार भजन में रत आपके कानों तक न पहुँची।
इधर माता के जाने पर इनके भजन में क्रमशः व्यवधान आने लगा। कई दिन पीछे विचार किया कि किसी वैष्णव का अपराध हो गया है। पता लगा कि माता आई थी और निराश होकर दुःखित-हृदय से वापिस लौट गई हैं।माता को बिना सन्तुष्ट किए भजन में घोरतर विघ्न की आशंका से आपने पत्र
लिख कर माताजी को फिर श्रीवृन्दावन बुलवाया। पूँछरी में उन्हें ठहरा कर उनकी सेवा करने लगे। भजन का आवेश कम होने लगा।, मातृ-सेवा और भजन, दोनों में क्रम से विघ्न होने लगा। इसी समय उत्कल देश से श्रीकृष्ण-चैतन्यदास नाम का एक ब्राह्मण-बालक पण्डित बाबाजी के निकट पहुँचा । भदावली के बाबाजी गुरु महाराज श्रीप्रभुदास जी के निकट दीक्षा और वेश ग्रहण कराके उसे अपने पास रख कर भजन शिक्षा देने लगे और उस श्रीकृष्ण-चैतन्यदास को अपनी माता की सेवा में नियुक्त कर दिया।श्रीकृष्ण-चैतन्यदास भी तीन वर्ष भजन कर भाव-सिद्धि को प्राप्त हो गए।सात-आठ वर्ष पीछे पूछरी में इनकी माताजी अन्तर्धान हो गयीं। तब पण्डित जी यथेष्ट आवेश से भजन में प्रवृत्त हो गये।
कुछ समय के बाद उस गुफा को छोड़ कर आपने बरसाने जाकर मयूर-कुटी पर आठ वर्ष गुप्त-वास किया। पुनः राघव-गुफा पर आकर दस वर्ष पर्यन्त मनोनिवेश पूर्वक भजन करते रहे। इस अन्तकाल में अनेक विस्मयकारी घटनाएँ घटीं।माघ मास में एक रात्रि को ये जलते हुए कोयले लेकर गुफा में घुसे एवं द्वार को बन्द कर दिया। कोयलों की गैस से प्राणान्त हो जाता है, आप यह नहीं जानते थे। फल स्वरूप विषैली-गैस से ये मूर्च्छित हो गए, किन्तु श्रीनिताईचाँद ने इन्हें गुफा से निकाल कर गिरिराज की तरहटी में सुला दिया।प्रातः काल की सर्दी से जब इन्हें चेतना हुई तो देखा वे गुफा में नहीं थे दो- तीन दिन तक आप चल फिर न सके।
एक दिन एक विषधर सर्प आकर इनके गले और छाती से लिपट गया। कुछ देर पीछे वह अपने आप चला भी गया। उसी रात को इन्हें यह ध्वनि सुनाई पड़ी कि तुम गुफा से अन्यत्र चले जाओ। तत्प्श्चात यह वहां से कुसुम-सरोवर पर श्याम -कुटी में आकर रहने लगे।
क्रमशः
श्रीगुरुगौरांगो जयते !!
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